पैतृक बनाम स्व-अर्जित: पिता की सम्पत्ति विभाजन पर सुप्रीम कोर्ट की 2026 तक की दिशा‑निर्देश
कानून में सम्पत्ति दो प्रकार की मानी जाती है – पैतृक (अनुक्रमित) और स्व-अर्जित। पैतृक सम्पत्ति में सभी बच्चों और कभी‑कभी पत्नी का जन्मसिद्ध अधिकार होता है, इसलिए इसे केवल एक बेटे को नहीं दिया जा सकता, जबकि स्व-अर्जित सम्पत्ति में पिता की इच्छा प्रमुख रहती है। 2005 के संशोधन और 2003‑2026 के सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों ने इस विभाजन को स्पष्ट किया है, और विवाद में प्रथम कदम सम्पत्ति के वर्गीकरण का निर्धारण है।

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com
सबसे पहली और अहम बात, संपत्ति पैतृक है या स्व-अर्जित ?
कानून की नजर में संपत्ति दो तरह की होती है। पैतृक यानी Ancestral और स्व-अर्जित यानी Self-Acquired। पैतृक संपत्ति वह है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही हो और जिसमें सभी वारिसों का जन्म से ही हक बनता हो। जबकि स्व-अर्जित संपत्ति वह है जो पिता ने अपने संसाधनों से अफनी कमाई खरीदी या बनाई हो। इसी बड़े फर्क के आधार पर तय होता है कि पिता एक बेटे को सब कुछ दे सकता है या नहीं।
पैतृक संपत्ति में एक बेटे को सब कुछ देना गैर-कानूनी
विवाद में यदि संपत्ति पैतृक है तो कानून कहता है कि पिता उसे अपनी मर्जी से केवल एक बेटे को नहीं दे सकता। पैतृक संपत्ति में सभी बेटों, बेटियों और कुछ मामलों में पत्नी का भी जन्मसिद्ध अधिकार होता है। अगर पिता ऐसा करते हैं तो अन्य वारिस अदालत में जाकर अपने हिस्से का दावा कर सकते हैं और ट्रांसफर को चुनौती दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि प्यार, दुलार और स्नेह के नाम पर पैतृक संपत्ति किसी एक ही बच्चे को गिफ्ट नहीं की जा सकती।
2005 का हिंदू उत्तराधिकार संशोधन: बेटियों का हक मजबूत
साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम से संपत्ति अधिकारों में बड़ा बदलाव आया। इससे पहले केवल बेटों को पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार मिलता था, बेटियां वंचित रह जाती थीं। लेकिन कानून में संशोधन के बाद बेटियों को भी सह-भागीदार बनाया गया और उन्हें पुत्रों की तरह ही अधिकार मिल गए। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के विनीता शर्मा केस में साफ किया कि बेटियों का पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार है, चाहे वे 2005 से पहले या बाद पैदा हुई हों।
सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले: 2003 से 2026 तक की गाइडलाइन
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर दिए गए फैसलों से इस मुद्दे पर स्पष्टता बढ़ाई है। 2003 के डी.एस. लक्ष्मैया केस में स्व-अर्जित संपत्ति की परिभाषा तय की गई। 2020 के विनीता शर्मा केस में बेटियों के अधिकारों को मजबूती मिली। 2022 के के.सी. लक्ष्मण केस में साफ किया गया कि पैतृक संपत्ति प्यार, दुलार या स्नेह के नाम पर एक बच्चे को नहीं दी जा सकती। 2026 के दोराईराज बनाम दोराईसामी केस में पैतृक आय से खरीदी गई संपत्ति को संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति माना गया।
साल 2026 में ताजा स्थिति
साल 2026 में भी कानून की बुनियादी स्थिति वही है। पैतृक संपत्ति में सभी का हक, स्व-अर्जित में पिता की मर्जी। हाल के राजस्थान हाईकोर्ट और अन्य अदालतों के फैसलों ने स्व-अर्जित संपत्ति पर पिता के अधिकारों को फिर से स्थापित किया है। जबकि पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुवैया सख्त बना हुआ है। इसलिए 2026 में भी यही नियम लागू हैं जो पिछले दो दशकों से चले आ रहे हैं।
विवाद कैसे सुलझाएं : अदालत जाने से पहले ये करें
अगर परिवार में ऐसा विवाद है तो सबसे पहले संपत्ति का प्रकार तय करें। मालूम करें कि प्रॉपर्ची पैतृक है या स्व-अर्जित। फिर देखें कि ट्रांसफर कैसे हुआ, वसीयत, गिफ्ट डीड या सेल डीड से? यदि पैतृक संपत्ति है और एक बेटे को सब कुछ दिया गया है तो अन्य वारिस तुरंत कानूनी सलाह लें और अदालत में दावा करें। दरअसल, यदि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस को सही तरीके से समझने की कोशिश की जाए तो कई मामले अदालत जाने से पहले ही सुलझ सकते हैं।
.Disclaimer : यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। किसी वास्तविक विवाद या मसले में लागू और संशोधित कानूनी प्रावधानों की जांच और संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर योग्य वकील से व्यक्तिगत राय लेना उचित है।
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