सुप्रीम कोर्ट के कठोर आदेशों के बावजूद उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माणों के ध्वस्त करने में ढील
सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में अवैध इमारतों को तोड़ने का कड़ा आदेश दिया, जिससे पूरे प्रदेश में ऐसे निर्माणों को हटाने की मांग तेज हुई। हालांकि दो दशकों से अधिक में 2.5 लाख से अधिक निर्माणों के ध्वस्त करने के आदेश दिए जा चुके हैं, कई मामलों में 1992‑93 के आदेशों पर भी अभी तक बुलडोजर नहीं चल पाया है। अदालत ने मुख्य सचिव पी. गुरु प्रसाद सहित अधिकारियों को कार्रवाई में कोई ढील न रखने की चेतावनी दी, परंतु जमीन स्तर पर कार्यान्वयन अभी भी पर्याप्त नहीं रहा है।

सौजन्य से:- Jagran
आदेश आते रहे-अतिक्रमण होते रहे, सुप्रीम कोर्ट की कड़ाई के बावजूद यूपी में अवैध निर्माणों पर कार्रवाई में ढिलाई
सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में अवैध निर्माणों पर कड़ा रुख अपनाया है, जिससे पूरे प्रदेश में ऐसे निर्माणों के ध्वस्तीकरण की नौबत आ सकती है।
अजय जायसवाल, लखनऊ। ‘अवैध निर्माण के प्रति किसी तरह की ढिलाई नहीं की जाएगी, एक-एक अवैध निर्माण ढहाया जाएगा, अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर हमें अभी बहुत लंबा जाना है’। देश की सर्वोच्च अदालत ने मेरठ के अवैध निर्माणों के प्रति कड़ा रुख दिखाते हुए अपने हालिया आदेश में जिस तरह की टिप्पणी की है उससे देर-सबेर प्रदेश के सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने की नौबत आ सकती है।
हालांकि, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि प्रदेश में अतिक्रमण-अवैध निर्माणों पर अंकुश लगाने का यह कोई पहला आदेश है बल्कि कोर्ट से लेकर राज्य सरकार तक पिछले तीन-चार दशक में दो दर्जन से अधिक कागजी आदेश पर आदेश करती रही हैं। उन आदेशों पर कड़ाई से अमल न होने का नतीजा है कि अतिक्रमण-अवैध निर्माण लगातार होते ही जा रहे हैं।
ढाई लाख से ज्यादा अवैध निर्माणों के ध्वस्तीकरण के आदेश
कागजी लिखा-पढ़ी में ही ढाई लाख से ज्यादा अवैध निर्माणों के ध्वस्तीकरण के आदेश हो चुके हैं लेकिन उन्हें अब तक ढहाया नहीं गया है। राजधानी लखनऊ में ही ऐसे अवैध निर्माण हैं जिनके ध्वस्तीकरण के आदेश वर्ष 1992-93 के हैं लेकिन अब तक उन पर बुलडोजर नहीं चल सका है।
आम आदमी के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सड़क-फुटपाथ से लेकर सार्वजनिक स्थलों पर अतिक्रमण और भू-उपयोग-मानचित्र का उल्लंघन कर बड़े पैमाने पर किए गए अवैध निर्माणों के प्रति बेहद कड़ा रुख दिखाया है।
जवाब मांगने के साथ ही नगर विकास, आवास एवं शहरी नियोजन विभाग की कमान संभालने वाले प्रमुख सचिव पी. गुरू प्रसाद तक को सीधे हिदायत भी दी है कि ‘आपने हमारा आदेश सुन लिया है, आपकी कार्रवाई में कोई ढिलाई न हो, आप कोर्ट के आदेश पर काम कर रहे हैं।‘ कोर्ट के कड़े रुख पर शासन स्तर पर नये सिरे से बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया है।
दरअसल, अतिक्रमण व अवैध निर्माण पर अंकुश लगाने के लिए निचली से लेकर शीर्ष अदालत तक के आदेश तो पहले भी कई हुए हैं लेकिन उन पर क्रियान्वयन के नाम पर अमूमन राज्य सरकार, अवमानना की स्थिति से बचने के लिए सिर्फ आवास आयुक्त से लेकर विकास प्राधिकरणों के उपाध्यक्षों को निर्देश जारी कर देती लेकिन धरातल पर कार्रवाई में ढिलाई से अतिक्रमण-अवैध कब्जे जहां के तहां बने ही रहे।
भवन निर्माण के मानकों व भू-उपयोग का उल्लंघन कर धड़ल्ले से अवैध निर्माणों का सिलसिला जारी रहा। इससे सड़क-फुटपाथ पर चलने से लेकर गाड़ियों की पार्किंग तक की समस्या तो बरकरार है ही, आम नागरिकों के सामने जीवन का संकठ और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की भी आशंका बढ़ती जा रही है।
अतिक्रमण रोकने को थानाध्यक्ष बनाए गए थे जिम्मेदार
अखिलेश सरकार के दौरान कोर्ट के कड़े रुख पर तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी की ओर से शहरी क्षेत्र में अवैध कब्जे, अतिक्रमण व अवैध निर्माण हटाने संबंधी जारी शासनादेश के तहत सार्वजनिक भूमि, फुटपाथ, पार्क आदि पर अतिक्रमण को रोकने के लिए थानाध्यक्ष जिम्मेदार बनाए गए थे।
कहा गया था कि अतिक्रमण हटाए जाने संबंधी थाने में एक रजिस्टर हो। अतिक्रमण हटाने के पहले व बाद की फोटो का एलबम भी रहे जिस पर संबंधित थानाध्यक्ष के प्रतिहस्ताक्षर हो।
अफसरों को हिदायत दी गई थी
अतिक्रमण-अवैध कब्जे हटाने में शिथिलता बरतने वाले अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के साथ ही कोर्ट के आदेशों के अवमानना के तहत भी कार्यवाही करने, अतिक्रमण हटाने पर आने वाले खर्च व संबंधित सामान को जब्त करने के साथ ही संबंधित अफसरों को हिदायत दी गई थी कि अतिक्रमण-अवैध कब्जे हटाने में किसी तरह का भेदभाव न किया जाए।
मंडलायुक्तों को इसकी नियमित समीक्षा भी करनी थी लेकिन मौजूदा स्थिति से साफ है कि कुछ नहीं किया गया। वर्ष 2010 में तत्कालीन मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता, वर्ष 2014 में मुख्य सचिव आलोक रंजन, वर्ष 2025 में मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह की ओर से भी अतिक्रमण-अवैध निर्माण पर अंकुश लगाने संबंधी शासनादेश जारी किया गया था। मुख्य सचिव के अलावा विभागीय प्रमुख सचिव-सचिव की ओर से तो बड़ी संख्या में शासनादेश जारी ही होते रहे।
प्रमुख शहरों में अवैध निर्माणों की स्थिति
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