हिमाचल कर्मचारी एक्ट का मामला: वोट बैंक से जुड़ा सरकारी कर्मचारियों का मसला कितना महत्वपूर्ण!
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल सरकार को झटका देते हुए SLP खारिज कर दिया है, जिससे कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट अवधि के लाभ मिलने का रास्ता खुल गया है। मनदीप चंदेल के अनुसार, अब सरकार के पास कोई विकल्प नहीं है, और रिव्यू पिटीशन, क्यूरेटिव पिटिशन, या बड़ी बैंच के पास जाने का विकल्प भी नहीं है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
हिमाचल के कर्मचारी एक्ट का मामला, सुप्रीम कोर्ट से SLP खारिज होने के बाद अब आगे क्या? यहां जानिए कानूनी विकल्प
सुप्रीम कोर्ट से स्पेशल लीव पिटिशन खारिज होने के बाद अब सरकार के पास क्या विकल्प बचे हैं. पढ़ें शिमला से रॉबिन शर्मा की रिपोर्ट
By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 2, 2026 at 5:00 PM IST
शिमला: हिमाचल में सत्ता का रास्ता काफी हद तक महत्वपूर्ण कर्मचारी वोट बैंक के झुकाव से तय होता है. इसी वोट बैंक के सबसे बड़े मसले में से एक पर हिमाचल की कांग्रेस सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने कर्मचारियों की भरी भरकम देनदारी से बचने के लिए एक एक्ट लाया था. हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी सेवा व शर्तें अधिनियम 2024 को लेकर हिमाचल सरकार को पहले हाईकोर्ट व फिर सुप्रीम कोर्ट में झटका लगा. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल SLP को खारिज कर दिया है. अब इस मसले पर आगे सरकार के पास क्या कानूनी विकल्प हैं, इसे लेकर ETV BHARAT ने कानून के जानकार मनदीप चंदेल से बातचीत की.
साफ हुआ कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट अवधि के लाभ मिलने का रास्ता
29 जुलाई 2026 को देश की शीर्ष अदालत में न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने स्टेट ऑफ हिमाचल बनाम देवेंद्र कुमार और अन्य के मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की उस एसएलपी को खारिज कर दिया, जिसमें हिमाचल हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार के सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों और वित्तीय लाभ से जुड़े अधिनियम को निरस्त किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी.
इस केस से जुड़े रहे अधिवक्ता मनदीप चंदेल ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की एसएलपी को खारिज कर दिया है और निर्देश दिए हैं कि 4 महीने के भीतर हिमाचल हाईकोर्ट के निर्णय को लागू किया जाए. मामले में हाईकोर्ट ने कर्मचारियों को लेकर बनाए गए नए कानून को रद्द करते हुए कर्मचारियों की सभी देनदारियां चुकाने का फैसला सुनाया था. इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने लागू करने के निर्देश दिए हैं"
अब सरकार के पास क्या विकल्प?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर मोहर लगा दी है. लिहाजा कर्मचारियों को लाभ मिलने का रास्ता खुल गया है, लेकिन अब सरकार के पास क्या विकल्प विशेष है. यह सवाल ईटीवी भारत ने मनदीप चंदेल से पूछा. मनदीप चंदेल ने कहा, "इस मामले में राज्य सरकार के पास अब कोई विकल्प शेष नहीं है. सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद फैसले को लागू करने के लिए 4 महीने का समय मांगा था. इस पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से राज्य सरकार को 4 महीने का समय दिया गया है. ऐसे में राज्य सरकार के पास ना तो रिव्यू पिटीशन और न ही क्यूरेटिव पिटिशन का विकल्प बचा है."
सरकार के लिए बंद हुआ रिव्यू और क्यूरेटिव पिटिशन का दरवाजा
आमतौर पर ऐसे मामलों में SLP खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता के पास रिव्यू पिटीशन, क्यूरेटिव पिटिशन या बड़ी बैंच के पास जाने का विकल्प बचता है. लेकिन राज्य सरकार के पास इस मामले में कोई विकल्प नहीं है. अधिवक्ता मनदीप चंदेल ने कहा कि राज्य सरकार के पास अब रिव्यू पिटीशन या क्यूरेटिव पिटिशन के जाने का विकल्प नहीं है.
मनदीप चंदेल ने वजह गिनवाते हुए कहा कि राज्य सरकार पहले ही फैसले को स्वीकार करते हुए समय मांग चुकी है. जजमेंट में किसी तरह का कोई एरर नहीं है. ऐसे में रिव्यू पिटीशन में जाने का सवाल नहीं बनता है. इसके अलावा निर्णय में कोई पक्ष या तथ्य छूट गया हो तो क्यूरेटिव पिटीशन में जाया जा सकता है, लेकिन इस जजमेंट में ऐसा कोई पहलू नहीं है. वहीं बड़ी बेंच के सामने भी मामला नहीं जा सकता. इस मामले पहले ही हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच तय कर चुकी है.
राज्य सरकार के पास केवल SLP का था विकल्प
राज्य सरकार के पास केवल एसएलपी दायर करने का विकल्प था. एसएलपी यानी स्पेशल लीव पिटिशन सुप्रीम कोर्ट में दायर की जाने वाली याचिका होती है. जब किसी पक्ष को हाईकोर्ट या अन्य न्यायाधिकरण के फैसले पर आपत्ति होती है, तो वह सुप्रीम कोर्ट से उस फैसले के खिलाफ अपील करने की अनुमति मांगता है. अनुमति मिलने पर ही सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई करता है. इस मामले में हिमाचल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही फैसला दे चुकी थी. ऐसे में राज्य सरकार के पास LPA यानी हाईकोर्ट की ही बड़ी बेंच के सामने जाने का अधिकार खत्म हो गया और केवल एसएलपी में जाने का रास्ता खुला था.
इन कर्मचारियों पर पड़ेगा फैसले का असर
फिलहाल सरकार फैसले को को स्वीकार कर चुकी है और इसे लागू करने के लिए 4 महीने का समय मांगा है. लेकिन अब सवाल उठता है कि आखिर इस फैसले का असर किन कर्मचारियों पर पड़ेगा. इस बारे में अधिवक्ता मनदीप चंदेल ने कहा कि इस निर्णय का लाभ उन सभी कर्मचारियों को मिलेगा जिनकी नियुक्ति नियमों के मुताबिक हुई है और उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट पीरियड काटा हो. मनदीप चंदेल ने कहा कि हालांकि PTA जैसी अन्य भर्तियों के कर्मचारियों को इसका लाभ नहीं मिल पाएगा. साथ ही भविष्य में होने वाली भर्तियों में भी अगर सरकार कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पीरियड पर रखती है तो उन्हें भी इसका लाभ मिलेगा.
जानिए मामले का पूरा घटनाक्रम?
हिमाचल प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के कॉन्ट्रैक्ट पीरियड को लेकर चल रही लड़ाई नई नहीं है. सबसे पहले साल 2017 में हिमाचल प्रदेश एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल ने कर्मचारियों के कॉन्ट्रैक्ट पीरियड से जुड़े लेखराम और अन्य बनाम स्टेट ऑफ हिमाचल मामले में कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था. इसी फैसले के आधार पर ताज मोहम्मद और अन्य की ओर से अनुबंध पीरियड के लाभ को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. इस पर हिमाचल हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने ताज मोहम्मद और अन्य की याचिका को स्वीकार करते हुए कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया.
इसके बाद मामले को राज्य सरकार की ओर से हिमाचल हाईकोर्ट की प्रिंसिपल डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दी गई. मामले पर 58 सुनवाइयों के बाद तब हिमाचल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम एस रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अदालत ने 3 अगस्त 2023 को ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के फैसले को सही ठहराते हुए ताज मोहम्मद और अन्य के पक्ष में फैसला सुनाया. राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की स्पेशल लीव पिटिशन को खारिज कर दिया.
हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने बनाया नया कानून
ताज मोहम्मद और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी खारिज होने के बाद राज्य सरकार ने दिसंबर 2024 के शीतकालीन सत्र में कर्मचारियों की सेवा शर्तों से जुड़ा नया विधेयक प्रस्तुत किया. धर्मशाला में आयोजित हुए इस शीतकालीन सत्र में राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी सेवा और शर्तें अधिनियम 2024 को ध्वनि मत से पारित कर दिया. राज्य सरकार के नए कानून को देवेंद्र कुमार और अन्य वर्सेस स्टेट ऑफ हिमाचल मामले में हिमाचल हाईकोर्ट के सामने चुनौती दी गई.
कर्मचारियों की सेवा शर्तों से जुड़े नए कानून को चुनौती देते हुए देवेंद्र कुमार और अन्य बनाम स्टेट ऑफ हिमाचल समेत कुल 445 याचिकाएं हिमाचल हाईकोर्ट में दायर की गई. मामले पर 27 सुनवाइयों के बाद हिमाचल हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा के डिवीजन बेंच ने 25 अप्रैल 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी सेवा शर्तें अधिनियम 2024 को निरस्त कर दिया. हिमाचल हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार शीर्ष अदालत पहुंची. जहां 29 जुलाई 2026 को राज्य सरकार की एसएलपी खारिज कर दी गई.
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