बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद उठे बड़े सवाल, क्या लाखों मतदाता गलत तरीके से हुए बाहर? - Jansatta
एक अधिवक्ता के तौर पर मैं समझता हूं कि अगर सर्वोच्च न्यायालय के दो माननीय न्यायाधीश अदालत में बोलते हैं, तो वह शीर्ष न्यायालय की राय होती है। सर्वोच्च अदालत एक संवैधानिक न्यायालय है, यह अंतिम अपीलीय अदालत भी है, कुछ मामल…

सौजन्य से:- Jansatta
एक अधिवक्ता के तौर पर मैं समझता हूं कि अगर सर्वोच्च न्यायालय के दो माननीय न्यायाधीश अदालत में बोलते हैं, तो वह शीर्ष न्यायालय की राय होती है। सर्वोच्च अदालत एक संवैधानिक न्यायालय है, यह अंतिम अपीलीय अदालत भी है, कुछ मामलों में इसके पास मूल क्षेत्राधिकार हैं, यह सभी अदालतों की निगरानी करता है, यह अपने ही निर्णयों की समीक्षा कर सकता है और उन्हें रद्द भी कर सकता है।
यह स्वत: संज्ञान लेकर किसी मामले की सुनवाई कर सकता है, इसे विशेष जांच दल या आयोग गठित करने का अधिकार है, इसे किसी मामले को जांच के लिए पुलिस को सौंपने का अधिकार है, यह किसी दीवानी या व्यावसायिक विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज सकता है, यह किसी मामले को एक उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से दूसरे उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर सकता है, यह किसी पुरुष और महिला को तलाकशुदा घोषित कर सकता है, इसे न्यायालय की अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने का अधिकार है, संविधान की उसकी व्याख्या अंतिम मानी जाती है, और इसे ‘पूर्ण न्याय’ के लिए कोई भी आदेश पारित करने का अधिकार है।
कहा जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय दुनिया की सबसे शक्तिशाली अदालत है।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
सर्वोच्च न्यायालय की व्यापक शक्तियों में से एक शक्ति विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। मद्रास राज्य बनाम वीजी राव मामले में शीर्ष अदालत ने स्वयं को संविधान का सतर्क प्रहरी बताया था। संविधान चुनावों के बारे में क्या कहता है?
- अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को संसद और प्रत्येक राज्य के विधानमंडल के लिए मतदाता सूची तैयार करने तथा सभी चुनावों के संचालन की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 326 यह निर्धारित करता है कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। (‘मतदान का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है’ – सर्वोच्च न्यायालय)
इन दोनों अनुच्छेदों में कोई विरोधाभास नहीं है। चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है कि वह देश के प्रत्येक वयस्क को मतदाता सूची में शामिल करे। नागरिकता और निवास जैसी अन्य योग्यताएं भी हैं, जो संविधान, नागरिकता अधिनियम-1955 तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 द्वारा निर्धारित की गई हैं। इन कानूनों में यह भी निर्धारित है कि कौन-सा प्राधिकारी और कौन-सी प्रक्रिया यह तय करेगी कि कोई व्यक्ति इन योग्यताएं पूरी करता है या नहीं।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का मूल आधार समावेशन है। मतदाता सूची से किसी का नाम हटाना एक अपवाद है और इसके लिए एक निर्धारित प्रक्रिया तथा लिखित निर्णय की व्यवस्था का पालन करना आवश्यक है, जिसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
रोचक टिप्पणियां
एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स बनाम निर्वाचन आयोग मामले में 27 मई, 2026 को दिए गए फैसले (बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर प्रक्रिया के संदर्भ में) में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां:
निर्वाचन आयोग ने एक जनवरी, 2003 को पात्रता तिथि मानते हुए वर्ष 2003 की मतदाता सूची को पात्रता के प्रमाण के रूप में मानने का निर्णय लिया, जब तक कि इसके खिलाफ कोई साक्ष्य न मिल जाए। वर्ष 2003 की मतदाता सूची में शामिल न होने वाले किसी भी व्यक्ति को मतदाता के रूप में अपनी पात्रता साबित करने के लिए एक या अधिक निर्धारित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। [इंदरजीत बरुआ (1985) और लाल बाबू हुसैन (1995) के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्टि की थी कि मतदाता सूची में शामिल नामों को नागरिकता की अनुमानित मान्यता प्राप्त है।]
जांच के दौरान यदि किसी व्यक्ति की पात्रता संदिग्ध पाई जाती है, तो ईआरओ या एईआरओ को उसे सूची से बाहर करने के प्रस्ताव का आधार बताते हुए कारण बताओ नोटिस जारी करना और एक तर्कसंगत एवं स्पष्ट आदेश देना अनिवार्य था। ईआरओ के फैसले से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति आरपी अधिनियम, 1969 की धारा 24(ए) के तहत जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अपील करने का हकदार होगा। दूसरी अपील धारा 24(बी) के तहत राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के समक्ष दायर की जा सकती है।
मतदाता सूची तैयार करने या उसमें संशोधन के दौरान निर्वाचन आयोग को निश्चित रूप से नागरिकता से संबंधित प्रश्नों की जांच करने का अधिकार है (‘सीमित जांच’- सर्वोच्च न्यायालय)। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
शीर्ष अदालत के फैसले में यह उल्लेख भी किया गया कि बिहार में एसआइआर प्रक्रिया के परिणामस्वरूप वर्ष 2003 की मतदाता सूची से लगभग 47,00,000 नाम हटा दिए गए। बिहार में प्रत्येक सौे वयस्कों में से छह व्यक्तियों को अंतिम मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया।
परिणाम का प्रमाण
बिहार एसआइआर मामले में फैसला सुनाए जाने से पहले ही पश्चिम बंगाल में एसआइआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। मतदाता सूची से लाखों नाम हटा दिए गए थे। वहां शीर्ष अदालत के आदेश पर तदर्थ न्यायिक अधिकारियों द्वारा न्यायिक समीक्षा की गई।
चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़ों एवं आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में एसआइआर प्रक्रिया की स्थिति इस प्रकार थी:
पहला चरण- मृत्यु, दोहराव, स्थानांतरण, अनुपस्थिति जैसे कारणों से मतदाता सूची से हटाए गए नाम – 63.66 लाख
संक्षिप्त समीक्षा के बाद मुख्यत: ‘तार्किक विसंगतियों’ के कारण मतदाता सूची से हटाए गए नाम- 27.16 लाख
कुल हटाए गए नाम – 90.82 लाख
तदर्थ न्यायिक अधिकारियों के समक्ष दायर आवेदन- 25 लाख (लगभग)
सुनवाई के बाद निपटाए गए आवेदन (14 मई, 2026 तक)- 6,581
स्वीकृत आवेदन और मतदाता सूची में पुन: पंजीकृत नाम – 4,043
सफलता दर- 61.43%
पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य था, जहां मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की सर्वोच्च न्यायालय-निर्देशित अनिवार्य न्यायिक समीक्षा प्रक्रिया अपनाई गई। बिहार में ऐसा नहीं हुआ। शीर्ष अदालत के फैसले और न्यायिक समीक्षा के परिणामों की तुलना कीजिए।
यदि हम पश्चिम बंगाल के नमूने की सफलता दर (61.43%) को बिहार में मतदाता सूची से हटाए गए नामों (47,00,000) पर लागू करें, तो यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि मतदान से वंचित रह गए लगभग 28,87,210 व्यक्ति मतदाता सूची में पुन: शामिल होने के पात्र होंगे।
यह निष्कर्ष चुनाव आयोग के खोखले दावों की सच्चाई और एसआइआर प्रक्रिया में त्रुटियों एवं विश्वसनीयता की कमी को उजागर करता है। निर्वाचन आयोग के इस रवैये से क्या देश में लोकतंत्र जीवित रहेगा?
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