सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर और अन्य से मांगा जवाब, Shiv Sena UBT MPs Merger पर फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना (यूबीटी) के नेता अरविंद गणपत सावंत की याचिका पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और अन्य को नोटिस जारी किया है. याचिकाकर्ता ने लोकसभा सेचिवालय के सर्कुलर को रद्द करने की मांग की है, जिसमें छह सांसदों की पार्टी संबद्धता में बदलाव किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि वह दो हफ्ते बाद मामले की सुनवाई करेगी.

सौजन्य से:- ETV Bharat
Shiv Sena UBT MPs Merger: सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर और अन्य से मांगा जवाब
याचिका में लोकसभा सचिवालय के उस सर्कुलर को रद्द करने की मांग की गई, जिसमें 6 सांसदों की पार्टी संबद्धता में बदलाव किया गया है.
By Sumit Saxena
Published : July 22, 2026 at 1:32 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को शिवसेना (UBT) के नेता अरविंद गणपत सावंत की याचिका पर लोकसभा स्पीकर और अन्य को नोटिस जारी किया. सावंत ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उन्होंने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में यूबीटी के छह बागी सांसदों के गुट को विलय को मान्यता दी गई थी.
इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने की. सावंत की याचिका में लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव और 6 सांसदों को प्रतिवादी बनाया गया है.
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने दलील दी कि यह मामला शिवसेना के 6 सांसदों के पार्टी संबद्धता से जुड़ा है और उन्होंने कोर्ट का ध्यान 18वीं लोकसभा में शिवसेना (UBT) के लिए लोकसभा की रिवाइज्ड पार्टी पोजीशन के बारे में एक सर्कुलर की ओर दिलाया.
कामत ने कहा, "यह किसी संयुक्त सचिव ने दिया और हस्ताक्षर किया था. हमें यह भी नहीं पता कि स्पीकर ने कोई आदेश पास किया है या नहीं… शिवसेना के पास शुरू में 7 सांसद थे. अब, इसमें 6 MP और जुड़ गए हैं, जिससे गिनती 13 हो गई है… हमारे पास 9 सांसद थे, जो घटकर तीन रह गए हैं."
वरिष्ठ वकील ने कहा कि सवाल यह है कि इन 6 सांसदों ने एकतरफा फैसला किया कि शिवसेना (UBT) हमारी विरोधी राजनीतिक पार्टी के साथ विलय हो रही है. पीठ ने पूछा, "क्या विलय को मंजूरी देने का कोई आदेश है? ऐसा कोई ऑर्डर नहीं है…."
कामत की दलीलें सुनने के बाद, पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी किया. कामत ने आगे कहा कि यह पूरी बात सिर्फ संसद सत्र के लिए की गई है और पीठ से अगले हफ्ते मामले की सुनवाई करने की अपील की. पीठ ने कहा कि वह दो हफ्ते बाद मामले की सुनवाई करेगी. कामत ने पीठ से अनुरोध किया कि याचिकाकर्ता की मांगी गई अंतरिम राहत पर दो हफ्ते बाद मामले की सुनवाई की जाए.
वकील निशांत पाटिल की तरफ से फाइल की गई याचिका में लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव के 18 जुलाई के सर्कुलर पर कड़ी आपत्ति जताई गई है, जिसमें छह सांसदों – भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल आष्टीकर, ओमप्रकाश राजे निंबालकर, संजय बंडू जाधव, संजय देशमुख और संजय दीना पाटिल – के शिंदे ग्रुप के साथ एकतरफा "विलय" के दावे को सही ठहराया गया था.
याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र में शीर्ष अदालत के समक्ष जाने के लिए बाध्य है, ताकि संयुक्त सचिव, लोकसभा सचिवालय (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा जारी 18 जून के पूर्व-दृष्टया असंवैधानिक, अवैध और विकृत परिपत्र को चुनौती दी जा सके.
याचिका में कहा गया है, "आरोपित सर्कुलर का उद्देश्य छह सांसदों के कृत्यों को मान्यता देना या मान्य करना है, जिन्होंने अपनी मूल राजनीतिक पार्टी [शिवसेना (यूबीटी)] की सहमति/स्वीकृति/अनुमति के बिना एकतरफा तौर पर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक पार्टी शिवसेना के साथ 'विलय' करने की मांग की है."
याचिका में कहा गया कि शिवसेना (यूबीटी) राजनीतिक पार्टी के 20 विधायक, 6 एमएलसी, 9 लोकसभा सांसद और एक राज्यसभा सांसद हैं. इसमें यह भी कहा गया कि विवादित सर्कुलर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसदों की संख्या छह कम करता है, जबकि एकनाथ शिंदे की पार्टी शिवसेना के सांसदों की संख्या छह बढ़ाता है.
याचिका में कहा गया है कि जिस सर्कुलर पर सवाल उठाया गया है, वह संवैधानिक हारा-किरी (जानबूझकर उठाया गया कदम) है और संसदीय लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर करता है.
याचिका में कहा गया है, "असल में, मौजूदा मामला संसद और राज्य विधानसभाओं में राजनीतिक पार्टियों के कामकाज को लेकर मौजूदा संवैधानिक संकट का एक बड़ा उदाहरण है. इस कोर्ट के लिए, संविधान के संरक्षक के तौर पर अपनी भूमिका निभाते हुए, उस सर्कुलर को रद्द करने के लिए प्रभावी निर्देश जारी करना और सदन में विरोधी राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर काम करके लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की प्रतिवादी नंबर 3 से 8 की कोशिशों को बेअसर करना बहुत जरूरी है."
याचिका में कहा गया कि यह बदलाव गैर-कानूनी, असंवैधानिक है और लोकसभा अध्यक्ष और लोकसभा सचिवालय दोनों की शक्तियों, जिम्मेदारियों और कामों से बाहर है.
याचिका में कहा गया, "10वीं अनुसूची का पैरा 4 विलय की अवधारणा को सिर्फ 10वीं अनुसूची के तहत शुरू की गई अयोग्यता की कार्रवाई में बचाव के तौर पर मानता है. इस मामले में, प्रतिवादी नंबर 3 से 8 के खिलाफ उनकी मूल राजनीतिक पार्टी, यानी शिवसेना (UBT) ने अभी तक कोई अयोग्यता की कार्रवाई शुरू नहीं की है. इसलिए, अगर विवादित सर्कुलर स्पीकर के किसी फैसले पर आधारित है, तो यह संसद के एक अधिकारी के तौर पर स्पीकर की शक्तियों और कामों के दायरे से बाहर है."
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह लोकसभा सचिवालय के 18 जून के सर्कुलर को रद्द करने का निर्देश दे, जिसमें "लोकसभा में शिवसेना (UBT) के 6 सांसदों की पार्टी संबद्धता में बदलाव" और उसके नतीजे में "18वीं लोकसभा में पार्टी की बदली हुई स्थिति" को मान्यता दी गई है.
यह भी पढ़ें- शिवसेना UBT के 6 सांसदों के विलय का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, याचिका में स्पीकर के फैसले पर उठाए सवाल
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