देवेंद्र फड़नवीस सरकार ने माओवादी शहरी नेटवर्क को रोकने हेतु विशेष सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम को आवश्यक घोषित किया
बॉम्बे हाई कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार ने Maharashtra Special Public Security Act, 2024 को सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये आवश्यक बताया, यह तर्क देते हुए कि राज्य की बड़ी शहरी जनसंख्या के कारण माओवादी अर्बन नेटवर्क का केंद्र बन गया है और 64 फ्रंट संगठनों पर कार्रवाई के लिए पहले उपयुक्त कानूनी साधन नहीं थे। याचिकाकर्ता इस कानून को अत्यधिक व्यापक शक्ति प्रदान करने और संविधानिक अभिव्यक्ति व सभा की आज़ादी को सीमित करने वाला कह कर चुनौती दे रहे हैं।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Maoist Urban Network: महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़नवीस सरकार राज्य में दिनों दिन बढ़ते माओवादी नेटवर्क पर लगाम लगाना चाहती है। सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में Maharashtra Special Public Security Act, 2024 को जरूरी कानून बताया है। सरकार ने बताया है कि महाराष्ट्र में माओवादी संगठनों से जुड़े 64 फ्रंट संगठन सक्रिय हैं।
नई दिल्ली : महाराष्ट्र के Maharashtra Special Public Security Act , 2024 से जुड़ी विरोध याचिका पर राज्य की देवेंद्र फड़नवीस सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। और इसे जरूरी कानून बताया है। सरकार ने हाई कोर्ट में Public Security Act का बचाव करते हुए कहा है कि राज्य अपनी बड़ी शहरी आबादी के कारण माओवादी अर्बन नेटवर्क का केंद्र बन गया है। सरकार का कहना है कि माओवादी गतिविधियां अब केवल दूरदराज के इलाकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शहरों में भी नेटवर्क और सहयोगी संगठनों के जरिए काम करती हैं। महाराष्ट्र में माओवादी संगठनों से जुड़े 64 फ्रंट संगठन हैं और ऐसे संगठनों पर कार्रवाई के लिए पहले पर्याप्त कानूनी ढांचा नहीं था। हालांकि इसके विरोध में याचिका कर्ताओं ने जो तर्क दिए और बॉम्बे हाई कोर्ट का पक्ष क्या रहा, आईए जानते हैं।
देवेंद्र फड़नवीस सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दिया हलफनामा
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि महाराष्ट्र अपनी सबसे बड़ी शहरी आबादी के कारण माओवादी अर्बन नेटवर्क का केंद्र बन गया है। सरकार के अनुसार, राज्य में माओवादी गतिविधियों से जुड़े 64 फ्रंट संगठन हैं, जो देश में सबसे ज्यादा बताए गए हैं। सरकार ने कहा कि तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों में ऐसे संगठनों पर कार्रवाई के लिए सार्वजनिक सुरक्षा कानून पहले से मौजूद हैं। महाराष्ट्र में ऐसा अलग कानूनी ढांचा नहीं था, इसलिए यह कानून लाया गया।
भीमा-कोरेगांव और अर्बन माओवाद की भी चर्चा
सरकार ने अपने पक्ष में भीमा-कोरेगांव हिंसा और एल्गार परिषद मामले का भी उल्लेख किया। हलफनामे में कहा गया कि इस मामले से कथित 'अर्बन एक्टिविटीज' और माओवादी नेटवर्क को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई। सरकार ने यह भी कहा कि जांच में मिले दस्तावेजों से उसके अनुसार नेटवर्क, संसाधनों और फ्रंट संगठनों की जानकारी सामने आई।
हलफनामे में केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों की चर्चा की गई है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र में 64 फ्रंट संगठनों का उल्लेख किया गया है। सरकार ने हाई कोर्कट को बताया कि ऐसे माओवादी नेटवर्क केवल हथियारबंद गतिविधियों से नहीं चलते, बल्कि वित्त, सुरक्षित ठिकानों और दूसरे सहयोगी ढांचों पर भी निर्भर करता है। जो कि राज्य में फैल चुका है और लगाम लगाए जाने की जरूरत है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति क्या है?
दरअसल इस कानून के विरोध में कांगेस पार्टी समेत अन्य याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून सरकार और प्रशासन को बहुत व्यापक शक्तियां देता है। उनका आरोप है कि 'Unlawful Activity' और 'Unlawful Organisation' जैसी परिभाषाएं इतनी व्यापक हैं कि इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और संगठन बनाने की आजादी तथा अनुच्छेद 21 के अधिकारों पर असर की बात कही गई है।
गौर करने वाली बात है कि बॉम्बे हाई कोर्ट में मौजूदा कार्यवाही में महाराष्ट्र सरकार ने इस कानून के विरोध में आई याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है और कानून को सार्वजनिक व्यवस्था तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है।
सरकार ने यह भी कहा कि कानून बनाने से पहले संयुक्त समिति के सामने 15,000 से अधिक लिखित आपत्तियों पर विचार किया गया और इसके बाद कुछ प्रावधानों में बदलाव भी किए गए।
लेकिन फिलहाल हाईकोर्ट ने इस संवैधानिक चुनौती पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। और मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को होने की संभावना है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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