सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल को संवैधानिक पाप मानते हुए चुनाव चिह्न पर सवाल उठाए
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के दो धड़ियों के बीच चिह्न विवाद पर सुनवाई में पूछा कि दलबदल करने वाले गुट को पार्टी का निशान देना उचित है या नहीं। कोर्ट ने यह भी जांचा कि क्या केवल विधायकों की संख्या को मानदंड बनाना पर्याप्त है, जबकि उन पर अयोग्यता की प्रक्रिया चल रही है। अगले दिन मामले की आगे की सुनवाई निर्धारित की गई।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद, सुप्रीम कोर्ट बोला- दलबदल संवैधानिक पाप:चुनाव आयोग दोनों को अलग-अलग निशान दे सकता था; 4 साल से चल रहा विवाद
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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को शिवसेना के चुनाव चिह्न विवाद पर सुनवाई हुई। इस दौरान CJI जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने पूछा कि क्या उन लोगों को पार्टी का निशान दिया जा सकता है जिन्होंने दलबदल जैसा संवैधानिक पाप किया है?
कोर्ट यह जानना चाहता है कि क्या सिर्फ विधायकों की संख्या को ही एकमात्र पैमाना मानना सही है, जबकि उन विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई कोर्ट में चल रही हो।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी पूछा था कि चुनाव आयोग दोनों गुटों को धनुष-बाण निशान देने से इनकार क्यों नहीं किया था। अब इस मामले की सुनवाई बुधवार को होगी।
शिंदे गुट बोला- विधायी बहुमत के आधार पर फैसला कानूनन सही
सुनवाई के दौरान शिंदे गुट ने दलीलें दी कि चुनाव आयोग का विधायी बहुमत के आधार पर फैसला लेना कानूनी रूप से सही था। उन्होंने कहा कि उनके पास पार्टी के अधिकतर चुने हुए विधायक और सांसद हैं (55 में से 40 विधायक और 18 में से 13 सांसद), जो यह साबित करता है कि वे ही असली शिवसेना हैं।
उन्होंने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(1)(a) के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करते समय स्पीकर को पहले यह तय करना पड़ सकता है कि विरोधी गुटों में कौन राजनीतिक दल है।
वकील ने यह भी कहा कि चुनाव चिह्न उस गुट को मिलना चाहिए, जो यह साबित करे कि वही असली राजनीतिक दल है। अगर कोई भी गुट यह दावा साबित नहीं कर पाए, तो स्थिति अलग होगी।
याचिकाओं में किए गए दावे
मुख्य याचिका उद्धव ठाकरे गुट के सुनील प्रभु ने दायर की है। इसमें महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर के 10 जनवरी 2024 के फैसले को चुनौती दी गई है। स्पीकर ने दसवीं अनुसूची के तहत शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार किया था।
उद्धव ठाकरे की ओर से दायर एक और याचिका में चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना माना गया था। इसी फैसले के तहत शिंदे गुट को पार्टी का धनुष-बाण चुनाव चिह्न भी दिया गया था।
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