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नई तकनीक से तेज हुई POCSO मामलों की जांच, तेलंगाना के इस केस ने पूरे देश को दिखाया पथप्रदर्शक

तेलंगाना के एक मामले ने भारत में पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत अपराधियों को सजा दिलाने के नए तरीके दिखाए हैं। ई-साक्ष्य ऐप, फोरेंसिक सबूत और डिजिटल चार्जशीट ने जांच को तेज और मजबूत बनाया है। यह मामला विशेषकर पॉक्सो अधिनियम के तहत हुए अपराधों के प्रकाशन के लिए मॉडल बन गया है। तेलंगाना में एक 15 वर्षीय लड़की के अपहरण और यौन उत्पीड़न के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराने की यह घटना महत्वपूर्ण है।

6 जुलाई 2026 को 12:57 pm बजे
नई तकनीक से तेज हुई POCSO मामलों की जांच, तेलंगाना के इस केस ने पूरे देश को दिखाया पथप्रदर्शक

सौजन्य से:- ETV Bharat

नए आपराधिक कानूनों से कैसे बदली POCSO मामलों की जांच? तेलंगाना का यह केस बना पूरे देश के लिए मॉडल

ई-साक्ष्य ऐप, डिजिटल चार्जशीट और फोरेंसिक सबूतों के तालमेल से आरोपियों को सजा दिलाने में काफी मदद मिल रही है. गौतम देबरॉय की रिपोर्ट.

Published : July 6, 2026 at 5:37 PM IST

नई दिल्लीः तेलंगाना में एक 15 साल की बच्ची के अपहरण और यौन उत्पीड़न के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराया जाना भारत के नए आपराधिक कानूनों के आदर्श कार्यान्वयन के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि, पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत मिली 20 साल के कठोर कारावास की सजा कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन जिस तरह से इस मामले की जांच की गई, वह बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों के पारंपरिक तौर-तरीकों से काफी अलग है.

पहले के कई मामलों के विपरीत, जो मुख्य रूप से पीड़िता के बयान, मेडिकल जांच और गवाहों के बयानों पर निर्भर होते थे. तेलंगाना मामले में जांचकर्ताओं ने कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर के केस को बेहद मजबूत बनाया. इसके लिए डीएनए प्रोफाइलिंग, फोरेंसिक जांच, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, ई-साक्ष्य एप्लीकेशन के माध्यम से डिजिटल दस्तावेजीकरण का उपयोग किया गया.

साथ ही, 'क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स' (CCTNS) और 'इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम' (ICJS) प्लेटफॉर्म के जरिए इलेक्ट्रॉनिक रूप से चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल की गई. इस मामले की जांच केवल 67 दिनों के भीतर पूरी कर ली गई, और 26 फरवरी 2025 को एफ़आईआर दर्ज होने के 398 दिनों के भीतर आरोपी को दोषी ठहरा दिया गया.

हालांकि, यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के तहत पॉक्सो (POCSO) का पहला दोषसिद्धि (conviction) मामला नहीं है. इस नए कानूनी ढांचे के तहत ओडिशा और तेलंगाना सहित कई राज्यों में पहले भी कई अपराधियों को सजा सुनाई जा चुकी है.

तेलंगाना मामले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि कैसे तीनों नए आपराधिक कानूनों का एक साथ इस्तेमाल किया गया. पीड़िता का बयान दर्ज करने और अपराध स्थल (क्राइम सीन) की वीडियोग्राफी करने से लेकर, सबूतों को डिजिटल रूप से सहेजने और पीड़िता के बयानों की पुष्टि के लिए डीएनए जांच पर भरोसा करने तक, सब कुछ एक साथ मिलकर किया गया.

क्या है मामला

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला एक 15 साल की नाबालिग लड़की को किडनैप करने और उसके साथ गंभीर यौन उत्पीड़न से जुड़ा है. लड़की के दूर के रिश्तेदार ने शादी का वादा करके उसके भरोसे का गलत इस्तेमाल किया. FIR दर्ज होने के बाद, येलारेड्डी पुलिस ने तुरंत पीड़िता को बचाया और पूरी जांच की. DNA प्रोफाइलिंग और फोरेंसिक जांच समेत साइंटिफिक सबूतों ने पीड़िता की गवाही की पुष्टि की. जांच तय समय में पूरी हुई, जिससे आरोपी को दोषी ठहराया गया और उसे 20 साल की सजा मिली.

पारंपरिक जांच के तौर-तरीकों में बदलाव

पहले की व्यवस्था- आईपीसी, सीआरपीसी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत चलती थी. जांच अक्सर मुख्य रूप से मौखिक बयानों, मेडिकल रिपोर्टों और दस्तावेजी सबूतों पर निर्भर होती थी. हालांकि डीएनए और फोरेंसिक विज्ञान की तकनीकें पहले भी उपलब्ध थीं, लेकिन सबूत जुटाने में देरी, सीमित फोरेंसिक क्षमता और प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण इनका इस्तेमाल हमेशा एक जैसा नहीं हो पाता था.

नया आपराधिक कानूनी ढांचा वैज्ञानिक जांच को बढ़ावा देकर, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की मान्यता का विस्तार करके और सबूत जुटाने व केस मैनेजमेंट का डिजिटलीकरण करके इसी व्यवस्था को बदलना चाहता है.

तेलंगाना मामले में, जांचकर्ताओं ने ई-साक्ष्य (e-Sakshya) ऐप के जरिए पंचनामा और गवाहों के बयान दर्ज किए. अपराध स्थल की वीडियोग्राफी की, डीएनए जांच के लिए जैविक नमूने भेजे और चार्जशीट डिजिटल रूप से दाखिल की. अधिकारियों का तर्क है कि इससे सबूतों की एक बेहद मजबूत कड़ाई तैयार हुई, जिसने अदालती सुनवाई के दौरान प्रक्रियात्मक चुनौतियों की गुंजाइश को काफी कम कर दिया.

पुराने पॉक्सो मामलों से तुलना

पॉक्सो मामलों की सुनवाई में अक्सर सबसे बड़ी चुनौतियां कम दोषसिद्धि दर (कम मामलों में सजा होना) और लंबी अदालती कार्रवाई रही हैं. सरकारी विश्लेषणों के अनुसार, नए आपराधिक कानूनों के लागू होने से पहले पॉक्सो मामलों में सजा की दर लगभग 34-35 प्रतिशत के आसपास ही रहती थी. जबकि लंबित मामलों की संख्या बेहद अधिक थी.

अदालत से कई आरोपियों के बरी होने की वजह आरोपों का कमजोर होना नहीं था, बल्कि अधूरी जांच, फोरेंसिक रिपोर्टों में देरी, गवाहों का अपनी बात से मुकर जाना या सबूत जुटाने में कमियां होना था.

इस मामले की जानकारी रखने वाले एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने ईटीवी भारत को बताया कि तेलंगाना का यह मामला तुरंत रेस्क्यू (बचाव कार्य), वैज्ञानिक सबूतों, डिजिटल दस्तावेजीकरण और कानूनी समय-सीमा का कड़ाई से पालन करके इन सभी कमियों को दूर करने का एक प्रयास है.

यह कोई इकलौती सजा नहीं है

अन्य राज्यों से भी नए कानूनी शासन के तहत अपराधियों को सजा मिलने की खबरें आई हैं. उदाहरण के लिए, ओडिशा की अदालतों ने नए कानूनों के लागू होने के बाद दर्ज किए गए पॉक्सो मामलों में सजा सुनाई है. जहां ऊपरी अदालतें इस बात की जांच कर रही हैं कि सबूतों और कानूनी अनुमानों को कैसे लागू किया गया.

फिर भी, तेलंगाना का यह मामला आधिकारिक तौर पर पेश किए गए सबसे व्यापक उदाहरणों में से एक है. क्योंकि यह पीड़िता को केंद्र में रखने वाली प्रक्रियाओं, डीएनए प्रोफाइलिंग, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, डिजिटल जांच उपकरणों और संसद द्वारा बनाए गए बीएनएस (BNS), बीएनएसएस (BNSS) व बीएसए (BSA) के तहत एक समन्वित अभियोजन (तालमेल के साथ की गई कार्रवाई) को एक साथ जोड़ता है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुए थे.

इसका व्यापक महत्व

आपराधिक न्याय विशेषज्ञों के लिए, तेलंगाना मामले का महत्व इस बात में कम है कि इसमें क्या सजा (जो कि पॉक्सो अधिनियम के तहत थी) दी गई, बल्कि इस बात में ज्यादा है कि यह जांच के किस मॉडल को दर्शाता है.

ईटीवी भारत से बात करते हुए, उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह ने सराहना की कि तीनों नए आपराधिक कानून एक निश्चित समय सीमा के भीतर न्याय सुनिश्चित करते हैं और यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकी रहेगी. उन्होंने कहा, "यहां तक कि पॉक्सो के मामले भी, जिनमें पहले गवाही और अदालती सुनवाई में सालों लग जाते थे, अब एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरे हो रहे हैं." हालांकि, सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन की स्वतंत्र समीक्षा और सत्यापन किए जाने की आवश्यकता है.

वरिष्ठ वकील मोहन श्याम ने कहा कि नए आपराधिक कानून अंततः भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को बदलते हैं या नहीं, यह किसी एक सफल कहानी पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगा कि सभी राज्य कितनी एकरूपता से वैज्ञानिक जांच को अपनाते हैं. फोरेंसिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करते हैं और समय पर सुनवाई सुनिश्चित करते हैं.

अधिवक्ता श्याम ने कहा, "तेलंगाना में दोषी ठहराया जाना एक उत्साहजनक उदाहरण है, लेकिन यह उन बढ़ते मामलों में से एक है जो भारत के नए आपराधिक न्याय ढांचे की प्रभावशीलता की परीक्षा ले रहे हैं."

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