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कानून के प्रति लापरवाही नहीं चलेगी, हलाला पर नहीं उसके दुरुपयोग पर सख्त होगा कानून: अदालत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हलाला पर अंतिम फैसला नहीं दिया है, बल्कि कहा है कि यदि किसी धार्मिक प्रक्रिया के नाम पर ऐसा कृत्य होता है, जो भारतीय दंड संहिता या पॉक्सो कानून के तहत अपराध है, तो आरोपी यह नहीं कह सकते कि पर्सनल लॉ उन्हें कानूनी संरक्षण देता है।

6 जुलाई 2026 को 05:56 pm बजे
कानून के प्रति लापरवाही नहीं चलेगी, हलाला पर नहीं उसके दुरुपयोग पर सख्त होगा कानून: अदालत

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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'हलाला पर नहीं, उसके दुरुपयोग पर सख्त है कानून':अधिवक्ता बोले- पर्सनल लॉ की आड़ में आपराधिक कानून से नहीं बचा जा सकता

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अमरोहा के चर्चित निकाह हलाला मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला केवल एक एफआईआर को बरकरार रखने का आदेश नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था के एक मूल सिद्धांत की पुनर्पुष्टि भी है कि धार्मिक परंपराएं संविधान और आपराधिक कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं।

इस फैसले के बाद यह धारणा बनाई जा रही है कि हाईकोर्ट ने हलाला को गैंगरेप घोषित कर दिया है। जबकि कानूनी रूप से ऐसा नहीं है। अदालत ने हलाला को अवैध नहीं कहा, बल्कि हलाला के नाम पर लगाए गए आरोपों को भारतीय दंड कानून की कसौटी पर परखा और पाया कि प्रथम दृष्टया ये गंभीर आपराधिक अपराध बनते हैं। इसलिए एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।

धार्मिक परंपरा नहीं, नाबालिग के अधिकार बने फैसले का आधार

एफआईआर के अनुसार पीड़िता की शादी नाबालिग अवस्था में हुई। तीन तलाक के बाद कथित तौर पर हलाला कराया गया, जिसमें एक मौलाना पर यौन शोषण का आरोप है। बाद में दूसरी बार तलाक होने पर दो अन्य लोगों पर भी हलाला के नाम पर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया गया।

यहीं से मामला धार्मिक परंपरा का न रहकर आपराधिक कानून का बन जाता है। क्योंकि POCSO अधिनियम स्पष्ट कहता है कि 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे के साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध अपराध है। इसमें सहमति का प्रश्न भी कानूनी महत्व नहीं रखता। इसी आधार पर अदालत ने माना कि पहली घटना पॉक्सो कानून के दायरे में आती है, जबकि बाद की घटना में दो लोगों पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सामूहिक दुष्कर्म की श्रेणी में आते हैं।

हाईकोर्ट ने हलाला को नहीं, अपराध को कठघरे में खड़ा किया

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत ने निकाह हलाला की संवैधानिक वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की।

वास्तव में हाईकोर्ट ने केवल इतना कहा कि यदि किसी धार्मिक प्रक्रिया के नाम पर ऐसा कृत्य होता है, जो भारतीय दंड संहिता या पॉक्सो कानून के तहत अपराध है, तो आरोपी यह नहीं कह सकते कि पर्सनल लॉ उन्हें कानूनी संरक्षण देता है।

यानी अदालत ने धार्मिक प्रथा पर नहीं, बल्कि उसके कथित दुरुपयोग पर अपनी टिप्पणी की है।

संविधान की कसौटी पर हर परंपरा को परखा जाएगा

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। अनुच्छेद-25 स्वयं सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

यदि किसी धार्मिक प्रथा के पालन में किसी महिला या नाबालिग की गरिमा, स्वतंत्रता या शारीरिक सुरक्षा प्रभावित होती है, तो वहां संविधान और आपराधिक कानून को प्राथमिकता मिलेगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी संवैधानिक सिद्धांत को दोहराया है।

तीन तलाक से लेकर हलाला तक... एक जैसी संवैधानिक बहस

यह फैसला उस संवैधानिक बहस की अगली कड़ी भी माना जा सकता है, जिसकी शुरुआत तीन तलाक के मामलों से हुई थी। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने शायरा बानो मामले में तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया था। हालांकि हलाला और बहुविवाह की संवैधानिक वैधता से जुड़ी याचिकाएं अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हाईकोर्ट ने हलाला पर अंतिम फैसला दे दिया है। अदालत ने केवल यह स्पष्ट किया है कि किसी भी धार्मिक परंपरा की आड़ लेकर आपराधिक कानून से बचा नहीं जा सकता।

फैसले का सबसे बड़ा संदेश

इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि धर्म और कानून के बीच टकराव की स्थिति में, यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों और शारीरिक गरिमा का प्रश्न हो, तो भारतीय संविधान सर्वोच्च रहेगा।

यह फैसला किसी धार्मिक प्रथा के पक्ष या विपक्ष का निर्णय नहीं है, बल्कि यह याद दिलाता है कि आस्था का सम्मान तभी तक है, जब तक उससे किसी के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन न हो।

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