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क्या कड़े कानून पेपरलीक को रोक सकते हैं?

नीट पेपर लीक मामले में सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं, लेकिन कानूनों को कठोर करने के बावजूद पेपर लीक जारी हैं। दोषियों को समय पर सजा न मिलने और एनटीए जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

24 जुलाई 2026 को 07:14 pm बजे
क्या कड़े कानून पेपरलीक को रोक सकते हैं?

सौजन्य से:- जागरण

संपादकीय: कड़े कानून कितने प्रभावी

केंद्र सरकार ने नीट पेपर लीक मामले में कड़े कदम उठाए हैं, लेकिन विपक्षी दल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़े हैं। कानूनों को कठोर करने के बावजूद पेपर लीक जारी हैं, जिससे दोषियों को समय पर सजा न मिलने और एनटीए जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

मुख्य बातें

- सरकार ने पेपर लीक रोकने को कड़े कदम उठाए हैं।

- कठोर कानून के बावजूद पेपर लीक की समस्या बनी हुई है।

- एनटीए और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में सुधार आवश्यक है।

बीते दो-तीन दिनों में परीक्षाओं और विशेष रूप से मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश परीक्षा नीट के पेपरलीक होने के मामले में केंद्र सरकार ने जो अनेक कदम उठाए, उनसे यह कहना कठिन है कि काकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दल संतुष्ट होंगे, क्योंकि वे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर अड़े हैं। इसमें संदेह है कि सरकार इस मांग पर सहमत होगी, लेकिन उसे यह तो सुनिश्चित करना ही चाहिए कि परीक्षाओं में पेपरलीक की समस्या का वास्तव में समाधान हो।

यह ठीक है कि उसने पेपरलीक के आरोपितों के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुने जाने की व्यवस्था करने के साथ ही सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम को कठोर करने का फैसला किया है, लेकिन इसकी अनदेखी न की जाए कि इस कानून को 2024 में भी कठोर किया गया था और इसके बाद भी पेपरलीक हुए। न केवल केंद्रीय परीक्षाओं के पेपरलीक हुए, बल्कि राज्यों की परीक्षाओं के भी।

स्पष्ट है कि कानूनों को कठोर करने मात्र से समस्या का समाधान होना तब तक कठिन है, जब तक दोषियों को समय रहते सख्त सजा नहीं मिलती। इस मामले में अभी तक का अनुभव कोई अच्छा नहीं रहा। गिनती के मामलों में ही पेपरलीक के दोषियों को दंड का भागीदार बनाया जा सका है, क्योंकि जांच एजेंसियों और अदालतों के तौर-तरीके में कोई ठोस बदलाव नहीं हुए। यह एक तथ्य है कि सीबीआइ 2024 के नीट पेपरलीक मामले के मुख्य अभियुक्त के खिलाफ पुख्ता प्रमाण नहीं जुटा सकी।

यह समझा जाए कि पेपरलीक संबंधी कानून को कठोर करने के साथ ही ऐसी व्यवस्था बनाने की भी आवश्यकता है, जिससे किसी परीक्षा में सेंध ही न लग सके। इसके लिए एनटीए और परीक्षाएं आयोजित-संचालित कराने वाली ऐसी ही अन्य संस्थाओं के कामकाज को भी सुधारना होगा। यह एक विडंबना ही है कि एनटीए का गठन केंद्रीय परीक्षाओं को सही तरह से कराने के लिए ही किया गया था, लेकिन यह संस्था अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी।

इसका एक कारण यह है कि वह परीक्षाओं के आयोजन में बाहरी सलाहकारों और विशेषज्ञों पर निर्भर हैं। क्या यह विचित्र नहीं कि जिस संस्था पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी है, उसके पास मामूली स्थायी स्टाफ है? हमें इस सच का भी सामना करना होगा कि कुछ मामलों में शिक्षक ही पेपरलीक में लिप्त पाए गए। नीट के पेपर भी शिक्षकों ने लीक कराए। यह नैतिक पतन का शर्मनाक उदाहरण है।

नैतिकता के इस पतन के कारण ही हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार पनप रहा है- शिक्षा और परीक्षा के क्षेत्र में भी। संकट यह है कि भ्रष्ट तत्वों को दंडित करने के मामले में सरकारें कोई उदाहरण पेश नहीं कर सकी हैं। जिस समाज में भ्रष्ट तत्व फलते-फूलते जा रहे हों, वहां कठोर होते कानून एक सीमा तक ही प्रभावी हो सकते हैं।

न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत

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