सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- गर्भवती आई. पी. एस. अधिकारी को छोड़कर अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण से क्यों रोका जाए?
सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती आई. पी. एस. अधिकारी को प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन को चुनौती देने के मामले में केंद्र से सवाल किया है. अदालत ने पूछा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह फिट है तो उसे केवल गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से क्यों रोका जाए.

सौजन्य से:- ndtv.in
गर्भवती महिला आई. पी. एस. अधिकारियों को प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन को चुनौती देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है. अदालत ने पूछा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह फिट है तो उसे केवल गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से क्यों रोका जाए. इस मामले में अब गुरुवार को सुनवाई होगी.सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट का ये आदेश अंतरिम आदेश है. अभी हाईकोर्ट ने इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है.
जानें कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या-क्या कहा गया
- लेकिन अगर कोई महिला बाद में ट्रेनिंग के लिए तैयार है और फिट है तो उसे ट्रेनिंग करने से क्यों रोका जाए
- एक ही नियम को सभी महिलाओं के लिए लागू कैसे किया जा सकता है
-हो सकता है कि कोई गर्भ धारण करने के दो साल बाद भी सर्जरी या अन्य किसी मेडिकल दिक्कत के चलते प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह फिट ना हो
- ऐसे में एक नियम से सभी से एक जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता है
-अदालत ने कहा कि महिलाओं के हित के लिए बनाई गई व्यवस्था का इस्तेमाल उनके अधिकार छीनने के लिए नहीं किया जा सकता.
- कोर्ट ने पूछा कि यदि महिला अधिकारी मेडिकल रूप से फिट है तो उसे प्रशिक्षण से रोकने का क्या औचित्य है.
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से यह भी पूछा कि क्या उर्वशी सेंगर को जून 2026 से शुरू हुए प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है.
- केंद्र सरकार ने दलील दी कि यदि एक अधिकारी को छूट दी गई तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में यही मांग उठेगी. वहीं उर्वशी सेंगर की ओर से कहा गया कि अतीत में कुछ महिला अधिकारियों को ऐसे मामलों में छूट दी जा चुकी है.
महिला आई. पी. एस. ने दायर की थी याचिका
बता दें कि गर्भवती महिला आई. पी. एस. अधिकारियों को प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन (ओम।) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. चुनौती देने वाली एक महिला आई. पी. एस. ही हैं. याचिका में कहा गया है कि आज के समय में ऐसे फैसले पुराने नियमों के बजाय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर होने चाहिए. ये याचिका मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आई. पी. एस. अधिकारी उर्वशी सेंगर ने दायर की है. उन्होंने नवंबर 2023 में फेज-1 प्रशिक्षण शुरू किया था. अप्रैल 2025 में फेज-2 प्रशिक्षण के दौरान वह गर्भवती हो गईं और इसकी जानकारी उन्होंने अकादमी को दी थी. इसके बाद उन्हें प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने और प्रसव के एक साल बाद अगले बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण लेने के लिए कहा गया.
मेडिकल फिटनेस के आधार पर महिला अधिकारी ने मांगी थी प्रशिक्षण की इजाजत
बच्चे के जन्म के बाद सितंबर 2025 में उन्होंने मेडिकल फिटनेस के आधार पर फेज-2 प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ( सी. ए. टी.) ने 1993 के नियम का हवाला देकर उनकी मांग ठुकरा दी. इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का रुख किया. 27 मई को सी. ए. टी. ने अंतरिम आदेश में उन्हें आवश्यक मेडिकल औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर फेज-2 प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दे दी थी हालांकि बाद में पुलिस अकादमी ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी थी. हाईकोर्ट ने 22 जून को सी. ए. टी. के आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि ये नियम महिला अधिकारी और उसके बच्चे दोनों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया था.
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि 1993 का नियम सभी गर्भवती अधिकारियों पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से लागू है. इसमें फेज-1 और फेज-2 प्रशिक्षण के बीच कोई अंतर नहीं किया गया. फेज-2 में कक्षा आधारित पढ़ाई, अकादमिक मॉड्यूल और संस्थागत प्रशिक्षण होता है, जो शारीरिक रूप से अत्यधिक कठिन नहीं है इसलिए केवल प्रेग्नेंट होने के आधार पर प्रशिक्षण से बाहर करना उचित नहीं है. याचिका में ये मांग भी की गई कि किसी अधिकारी की व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए न कि सभी पर एक जैसा प्रतिबंध लगाया जाए.
क्या था 1993 का गृहमंत्रालय का वो ज्ञापन
23 अगस्त 1993 को गृह मंत्रालय के एक ज्ञापन में कहा गया था कि महिला आई. पी. एस. प्रोबेशनर प्रशिक्षण के दौरान गर्भधारण से बचें और अगर यदि कोई अधिकारी प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है तो उसकी ट्रेनिंग तुरंत रोक दी जाएगी. महिला अधिकारी डिलीवरी के एक साल बाद ही प्रशिक्षण दोबारा शुरू कर सकेंगी. इस टाइम को असाधारण अवकाश माना जाएगा हालांकि उसकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी.
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