हत्याकांड के तीन आरोपितों को बरी किया गया, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी मिली
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सिंगरौली हत्याकांड के तीन आरोपितों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूर्ण और अखंड श्रृंखला स्थापित करने में अभियोजन पक्ष विफल रहा।

सौजन्य से:- Jagran
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी टूटी, हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा की निरस्त; सिंगरौली हत्याकांड के तीन आरोपित बरी
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सिंगरौली हत्याकांड में आजीवन कारावास पाए तीन आरोपितों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अधू ...और पढ़ें
HighLights
- हाई कोर्ट ने सिंगरौली हत्याकांड के तीन आरोपित बरी किए।
- परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी और अविश्वसनीय पाई गई।
- ट्रायल कोर्ट का आजीवन कारावास का फैसला निरस्त किया गया।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हत्या के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में दोष सिद्धि तभी संभव है, जब सबूतों की पूरी शृंखला संदेह से परे और पूरी तरह विश्वसनीय हो। इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने सिंगरौली के चर्चित हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा पाए तीन आरोपितों को बरी कर दिया।
न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने भैयालाल रावत एवं अन्य की ओर से दायर आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए देवसर (जिला सिंगरौली) के तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा 14 जून 2025 को सुनाया गया दोष सिद्धि और आजीवन कारावास का फैसला निरस्त कर दिया। अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता बी.के. वैश्य और राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता अजय ताम्रकार ने पक्ष रखा।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी मिली
मामला गोरेलाल विश्वकर्मा की हत्या से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपितों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 34 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूर्ण और अखंड श्रृंखला स्थापित करने में विफल रहा। अदालत ने कहा कि अभियोजन का 'लास्ट सीन' सिद्धांत कई विरोधाभासों से घिरा हुआ था। प्रमुख गवाह के बयान और केस डायरी में घटना के समय को लेकर गंभीर असंगतियां सामने आईं।
गमछे की पहचान भी नहीं मानी विश्वसनीय
अदालत ने यह भी माना कि मृतक के गले में मिले गमछे की पहचान भरोसेमंद नहीं थी। पहचान करने वाले गवाह ने स्वीकार किया था कि पुलिस पहले ही उसे वह गमछा दिखा चुकी थी, जिससे पहचान की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए।
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इसके अलावा न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि प्रारंभिक एफआईआर अज्ञात आरोपितों के खिलाफ दर्ज की गई थी और शुरुआती बयानों में अपीलकर्ताओं पर किसी प्रकार का संदेह भी व्यक्त नहीं किया गया था। रिकॉर्ड में दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश का भी उल्लेख मिला।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के 'शरद बिर्धिचंद सरडा बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने अपील स्वीकार कर ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया और तीनों आरोपितों की तत्काल रिहाई के आदेश जारी किए।
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