सीता पर विवादित टिप्पणी मामले में भजन संध्या संचालक को अग्रिम जमानत
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने सिवनी में आयोजित एक भजन संध्या में सीता पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले संचालक को अग्रिम जमानत दी है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया आपराधिक मंशा नहीं दिखती, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान का मौलिक अधिकार है।

सौजन्य से:- Jagran
'मंशा गलत नहीं थी', सीता पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले भजन संध्या संचालक को MP हाई कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने सिवनी में सीता पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में भजन संध्या संचालक को अग्रिम जमानत दी। ...और पढ़ें
HighLights
- सिवनी भजन संध्या में सीता पर टिप्पणी का मामला।
- MP हाई कोर्ट ने दी संचालक को अग्रिम जमानत।
- कोर्ट ने कहा, प्रथम दृष्टया आपराधिक मंशा नहीं।
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने सिवनी जिले में आयोजित एक भजन संध्या के संचालक को सीता पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में अग्रिम जमानत दे दी।
कोर्ट ने कहा कि रामचरितमानस की चौपाई की व्याख्या करते समय आवेदक द्वारा शब्दों का चयन उचित नहीं रहा हो सकता है, लेकिन प्रथमदृष्टया उसकी मंशा वैसी नहीं दिखती, जैसा अभियोजन पक्ष आरोपित कर रहा है। न्यायालय ने यह भी दोहराया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान का मौलिक अधिकार है और उसकी रक्षा करना अदालतों का दायित्व है।
यह है मामला
सिवनी जिले में आयोजित एक भजन संध्या के दौरान रामचरितमानस की चौपाई की व्याख्या करते समय सीता के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने पर संचालक के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 353(2) एवं 353(3) के तहत अपराध दर्ज किया गया था। आरोप था कि धार्मिक समारोह में दिए गए कथन से समुदायों के बीच वैमनस्य फैल सकता है और धार्मिक भावनाएं भड़क सकती हैं। इसके बाद आरोपी ने गिरफ्तारी से संरक्षण के लिए हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने कहा कि किसी कथन की भाषा या शब्दों से असहमति अलग बात है, लेकिन केवल उसी आधार पर आपराधिक मंशा नहीं मानी जा सकती। प्रथम दृष्टया ऐसा कोई आधार नहीं दिखता कि आवेदक का उद्देश्य वैमनस्य फैलाना था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाई कोर्ट ने इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार न्यायाधीशों को बोले या लिखे गए शब्द पसंद नहीं आते, फिर भी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना उनका संवैधानिक दायित्व है। न्यायालय संविधान और उसके आदर्शों के प्रति उत्तरदायी हैं।
खबरें और भी
प्वाइंटर
- सिवनी जिले की भजन संध्या से जुड़ा मामला।
- बीएनएस की धारा 353(2) एवं 353(3) के तहत अपराध दर्ज।
- न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने दी राहत।
- कोर्ट ने कहा- शब्द अनुचित हो सकते हैं, पर प्रथम दृष्टया आपराधिक मंशा नहीं।
- सुप्रीम कोर्ट के इमरान प्रतापगढ़ी फैसले का दिया हवाला।
- अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार, गिरफ्तारी से संरक्षण।
यह भी पढ़ें: मध्य प्रदेश: चाय न बनाने पर पति ने पत्नी को जिंदा जलाया, अदालत ने सुनाई उम्रकैद की सजा
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