बुजुर्ग की संपत्ति से बेटे-बहू की बेदखली बरकरार: सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ हाईकोर्ट का फैसला पलटा - Lucknow News
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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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बुजुर्ग की संपत्ति से बेटे-बहू की बेदखली बरकरार:सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ हाईकोर्ट का फैसला पलटा
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लखनऊ के विकास नगर स्थित मकान से बेटे और बहू को बेदखल करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें SDM और जिला मजिस्ट्रेट के बेदखली आदेश को निरस्त किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अधिकारियों के आदेश बहाल करते हुए स्पष्ट किया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 (वरिष्ठ नागरिक अधिनियम) के तहत गठित ट्रिब्यूनल वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरत पड़ने पर परिवार के सदस्य की बेदखली का आदेश दे सकता है।
8/331 विकास नगर का है मकान
मामला विकास नगर के मकान नंबर 8/331 का है। इसके मालिक रवि कांत गुप्ता हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक यह उनकी स्वयं अर्जित संपत्ति है। गुप्ता की करीब 81 वर्षीय मां को घर में रहने में परेशानी हुई और उन्हें वृद्धाश्रम/ओल्ड एज फैसिलिटी में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद गुप्ता ने 5 जून 2022 को अपने बेटे को मकान से बेदखल करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दिया था।
SDM ने बेटे को बेदखली का आदेश दिया
मामले की सुनवाई के बाद SDM ने 15 नवंबर 2022 को आदेश पारित किया। SDM ने माना कि मकान गुप्ता की स्वयं अर्जित संपत्ति है। आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि बेटे ने अपनी दादी को मकान में रहने की अनुमति नहीं दी और वहां परेशानी/उपद्रव की स्थिति पैदा की। SDM ने बेटे को मकान से बेदखल करने का निर्देश दिया।
DM ने भी SDM का आदेश रखा बरकरार
बेटे और उसकी पत्नी ने SDM के आदेश के खिलाफ वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 16 के तहत अपील की। जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को SDM के आदेश को बरकरार रखा और बेटे-बहू को मकान का कब्जा रवि कांत गुप्ता को सौंपने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने दोनों आदेश किए थे रद्द इसके बाद बेटे और बहू ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में दाखिल की। हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर 2023 को SDM और जिला मजिस्ट्रेट के दोनों आदेश रद्द कर दिए थे। हाईकोर्ट का कहना था कि 2007 के वरिष्ठ नागरिक अधिनियम में संबंधित अधिकारियों को बेदखली का आदेश देने की शक्ति नहीं है। रवि कांत गुप्ता ने हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ रिव्यू दाखिल किया, लेकिन 29 जनवरी 2024 को वह भी खारिज हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने अब बदला पूरा मामला
रवि कांत गुप्ता ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 4 अगस्त 2026 को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने हाईकोर्ट के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए बेदखली का आदेश देने की शक्ति है। कोर्ट ने कहा कि जब कानून किसी ट्रिब्यूनल को अधिकार देता है तो उस अधिकार को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए जरूरी कदम उठाने की शक्ति भी उसमें निहित होती है।
वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा और सुरक्षा पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी गरिमा, सम्मान और सुरक्षा देता है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 41 का उल्लेख करते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को उपेक्षा, असुरक्षा और गरिमा के हनन से बचाने के लिए 2007 का कानून बनाया गया है। कोर्ट ने एस. वनिता, समतोल देवी और कमलाकांत जैसे मामलों में दिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया और कहा कि वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा के लिए आवश्यक होने पर बेदखली को उसके संरक्षण के अधिकार को लागू करने का हिस्सा माना जा सकता है। हाईकोर्ट का फैसला पलटा, बेदखली आदेश बहाल सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का 6 अक्टूबर 2023 का फैसला और 29 जनवरी 2024 का रिव्यू आदेश दोनों रद्द कर दिए। इसके साथ ही SDM के 15 नवंबर 2022 और जिला मजिस्ट्रेट के 9 अगस्त 2023 के बेदखली आदेश बहाल हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मामले में लागत लगाने का कोई आदेश नहीं दिया। यानी लखनऊ के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरी होने पर 2007 के कानून के तहत ट्रिब्यूनल बेटे या परिवार के अन्य सदस्य को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है।
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