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'धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक कानून व्यवस्था से ऊपर नहीं' पटना हाईकोर्ट का महावीरी झंडा मेला पर बड़ा फैसला

'धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक कानून व्यवस्था से ऊपर नहीं' पटना हाईकोर्ट का महावीरी झंडा मेला पर बड़ा फैसला अखाड़े की ओर से हाईकोर्ट में 300 लोगों को जुलूस निकालने की अनुमति मांगी गई थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया. रिपोर…

23 अगस्त 2026 को 03:54 am बजे
'धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक कानून व्यवस्था से ऊपर नहीं' पटना हाईकोर्ट का महावीरी झंडा मेला पर बड़ा फैसला

सौजन्य से:- ETV Bharat

'धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक कानून व्यवस्था से ऊपर नहीं' पटना हाईकोर्ट का महावीरी झंडा मेला पर बड़ा फैसला

अखाड़े की ओर से हाईकोर्ट में 300 लोगों को जुलूस निकालने की अनुमति मांगी गई थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया. रिपोर्ट-आनंद वर्मा

Published : August 23, 2026 at 9:11 AM IST

पटना: पटना हाईकोर्ट ने सिवान जिला के हथौड़ा गांव के अखाड़ा नंबर 1 के महावीरी जुलूस के मामलें पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है और राज्य सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान रखता है. जस्टिस आलोक कुमार की एकलपीठ ने दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की.

कोर्ट ने कहा कि, धार्मिक जुलूस निकालना अनुच्छेद 19(1)(बी) और अनुच्छेद 25 के तहत संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है.

'असीमित स्वतंत्रता समाज के लिए हानिकारक' : कोर्ट ने कहा कि असीमित स्वतंत्रता समाज के लिए हानिकारक हो सकती है, इसलिए उचित प्रतिबंध जरूरी हैं. भविष्य में 5 लोगों तक ही सीमित रखने की आशंका अभी काल्पनिक है और यह उस समय की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेगी.

क्या है पूरा मामला? : बिहार के सिवान जिले के हथौड़ा गांव के एक याचिकाकर्ता ने एक अखाड़े की ओर से पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें करीब 300 लोगों को जुलूस निकालने की अनुमति देने की मांग की गई थी. श्रद्धालु ने अपनी याचिका में कहा कि ''1958 से हर साल भाद्रपद कृष्ण पक्ष के 11वें दिन महाबीरी जुलूस का लाइसेंस अखाड़ा नंबर 1 को मिलता रहा है.''

सिवान के हथौड़ा गांव निवासी आवेदक का कहना था कि ''साल 2012 और 2013 में 200 लोगों को अनुमति मिली, लेकिन पुलिस ने धीरे-धीरे बिना कारण बताए संख्या को घटाते चला गया. 2014 में 150, 2015 में 100 और 2023 से सिर्फ 5 श्रद्धालुओं को अनुमति दी गई. साथ ही पारंपरिक मार्ग भी बदल दिया गया.''

धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन पर सवाल : आवेदक की ओर से अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा गया कि ''यह धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन हैं.'' उनका कहना था कि ''सिवान के एसडीपीओ ने 31 अक्टूबर, 2024 की रिपोर्ट में कई अखाड़ों के लोगों को एक साथ जोड़कर कानून-व्यवस्था का बढ़ा-चढ़ाकर हवाला दिया गया है.''

'तलवार वाले अन्य जुलूस की अनुशंसा भेदभावपूर्ण' : आवेदक ने आगे कहा, जबकि उसी मार्ग पर एक हजार लोगों के लाठी-भाला और तलवार वाले अन्य जुलूस की अनुशंसा की गई, जो भेदभावपूर्ण है.

राज्य सरकार ने क्या कहा था? : वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि 2015 से 2022 के बीच 5 लोगों की अनुमति के बावजूद 1700 से 2000 लोग जुटते थे. जिससे कई केस दर्ज हुए. 2024 में जुलूस के दौरान बीडीओ की सरकारी गाड़ी में आग लगाई गई और पुलिस पर पथराव भी हुआ, इसलिए संख्या सीमित करना जरूरी था.

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