हिबा में रजिस्ट्रेशन काफी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण निर्णय
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम कानून के तहत वैध हिबा के लिए संपत्ति का वास्तविक कब्ज़ा देना अनिवार्य है, केवल रजिस्ट्री काफी नहीं है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जिसमें एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड को अमान्य कर दिया गया था।

सौजन्य से:- Law Trend
इस्लामी कानून के तहत उपहार (हिबा) की आवश्यक शर्तों पर महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल गिफ्ट डीड का रजिस्ट्रेशन या उसमें दर्ज विवरण मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कब्ज़ा सौंपने की कानूनी शर्त को पूरा नहीं करते हैं। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित किया गया था, क्योंकि संबंधित संपत्ति के एक हिस्से पर परिवार के अन्य सदस्य लगातार काबिज थे। अदालत ने इस संबंध में दायर प्रथम अपील को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
विवादित संपत्ति रायपुर के खनिज नगर, पुरैना तेलीबांधा में स्थित 1,500 वर्ग फीट का एक प्लॉट है। इस संपत्ति को परिवार के मुखिया (ससुर) ने वर्ष 1994 में हाउसिंग बोर्ड से अपनी कंपनी की हाउसिंग स्कीम के तहत खरीदा था।
मामले में वादी (दिवंगत बेटे की पत्नी और उनके दो नाबालिग बच्चे) का पक्ष था कि उनके दिवंगत पति ने ठेकेदारी और चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति का व्यवसाय शुरू किया था और इस जमीन की खरीद के लिए धनराशि का भुगतान किया था। वर्ष 2005 में विवाह के बाद, दिवंगत पति ने अपनी आय से 1,000 वर्ग फीट क्षेत्र में मकान बनवाया और बाद में निजी फाइनेंस कंपनी से 5 लाख रुपये का ऋण लेकर 370 वर्ग फीट क्षेत्र में एक और आवासीय हिस्सा निर्मित कराया। जून 2018 में पति के निधन के बाद परिवार में विवाद उत्पन्न हो गया।
इसके बाद, मार्च 2019 में ससुर ने पूरी संपत्ति अपनी पत्नी और तीन बेटियों के नाम एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के ज़रिए संयुक्त रूप से हस्तांतरित कर दी। गिफ्ट डीड के आधार पर इन रिश्तेदारों ने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा लिया और महिला व उनके नाबालिग बच्चों को बेदखल करने का प्रयास किया।
इसके खिलाफ महिला और उनके बच्चों ने 11वें जिला न्यायाधीश, रायपुर की अदालत में दीवानी मुकदमा दायर कर गिफ्ट डीड को शून्य घोषित करने और स्थायी रोक (इंजंक्शन) की मांग की। नवंबर 2025 में ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए गिफ्ट डीड को अमान्य कर दिया और स्थायी रोक लगा दी। इस फैसले से असंतुष्ट होकर ससुर, सास और बेटियों ने हाईकोर्ट में प्रथम अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि ससुर संपत्ति के एकमात्र और अनन्य मालिक थे, जिन्होंने अपनी कमाई से जमीन खरीदी थी और दिवंगत बेटे का इसमें कोई वित्तीय योगदान नहीं था। इसलिए, वे अपनी पत्नी और बेटियों के पक्ष में गिफ्ट डीड निष्पादित करने के लिए पूरी तरह सक्षम थे। उन्होंने दावा किया कि उपहार कानूनी रूप से पूरा किया गया था, पजेशन सौंप दिया गया था और महिला केवल अनधिकृत कब्ज़ाधारी के रूप में रह रही थी।
दूसरी ओर, महिला और उनके बच्चों की ओर से दलील दी गई कि यह गिफ्ट डीड मुस्लिम कानून के तहत हिबा की अनिवार्य शर्तों को पूरा नहीं करती। महिला और उनके बच्चे 370 वर्ग फीट के आवासीय हिस्से पर लगातार और स्थापित कब्ज़े में थे, और गिफ्ट डीड के तहत वास्तविक रूप से संपत्ति का भौतिक कब्ज़ा नहीं सौंपा गया था। इसके अलावा, उपहार पत्र में चार संयुक्त प्राप्तकर्ताओं के हिस्से को अलग-अलग निर्दिष्ट नहीं किया गया था।
अदालत का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध उपहार की कानूनी आवश्यकताओं का विस्तार से परीक्षण किया। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि वैध हिबा के लिए तीन तत्वों का एक साथ होना आवश्यक है: दाता द्वारा उपहार की घोषणा, आदाता द्वारा स्वीकृति, और कब्ज़े की वास्तविक सुपुर्दगी।
अदालत ने पाया कि हालांकि घोषणा और स्वीकृति रजिस्टर्ड दस्तावेज़ से साबित होती हैं, लेकिन पूरी संपत्ति का कब्ज़ा कभी नहीं सौंपा गया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“मुस्लिम कानून के तहत, उपहार बिना किसी प्रतिफल के संपत्ति का एक स्वैच्छिक हस्तांतरण है और एक वैध हिबा के लिए आवश्यक शर्तें हैं: (i) दाता द्वारा उपहार की घोषणा; (ii) आदाता द्वारा या उसकी ओर से उपहार की स्वीकृति; और (iii) उपहार की विषय-वस्तु के कब्ज़े की सुपुर्दगी।”
रजिस्ट्रेशन के प्रभाव पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कानूनी पंजीकरण करा लेने से ही मुस्लिम कानून के तहत उपहार स्वतः वैध नहीं हो जाता:
“केवल किसी दस्तावेज़ का निष्पादन या पंजीकरण ही, अपने आप में, मुस्लिम कानून के अनुसार एक वैध हिबा स्थापित करने की आवश्यकता से छूट नहीं देता है।”
गिफ्ट डीड में कब्ज़ा सौंपने के दावों पर अदालत ने कहा:
“रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड में केवल यह उल्लेख होना कि उपहार में दी गई संपत्ति का कब्ज़ा आदाताओं को दे दिया गया था, वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, पूरी वाद संपत्ति का वास्तविक कब्ज़ा सौंपे जाने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने पाया कि महिला 2005 से ही 370 वर्ग फीट के हिस्से में रह रही थी और पति के जीवनकाल में ससुर ने कभी इसका विरोध नहीं किया था। अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि ससुर ने खुद को कब्ज़े से अलग कर लिया था या बेटियों व पत्नी ने अनन्य कब्ज़ा प्राप्त कर लिया था।
इसके अलावा, अदालत ने ‘मुशा’ (अविभाजित हिस्से) के सिद्धांत का भी उल्लेख किया और माना कि प्रत्येक प्राप्तकर्ता का हिस्सा तय किए बिना चार लोगों को एक साथ अविभाजित संपत्ति देना, और साथ ही कब्ज़ा न सौंपना, इस लेन-देन को कानूनी रूप से अधूरा बनाता है।
स्थापित कब्ज़े (सेटल-पजेशन) के संरक्षण पर बल देते हुए अदालत ने कहा:
“यह एक स्थापित सिद्धांत है कि स्वामित्व का दावा करने वाला व्यक्ति भी कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता और किसी ऐसे व्यक्ति को ज़बरदस्ती बेदखल नहीं कर सकता जो सेटल्ड पजेशन (स्थापित कब्ज़े) में है।”
अदालत का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता यह साबित करने में असमर्थ रहे कि पूरी संपत्ति पर प्रभावी कब्ज़ा सौंपे जाने के कारण मुस्लिम कानून के तहत उपहार वैध रूप से पूरा हुआ था। ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि न पाते हुए, हाईकोर्ट ने 24 नवंबर 2025 के निर्णय और 27 नवंबर 2025 की डिक्री को बरकरार रखा और प्रथम अपील को खारिज कर दिया। सभी पक्षों को अपना-अपना मुकदमा खर्च स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्रीमती शकीला परवीन एवं अन्य बनाम श्रीमती नसीमा अली एवं अन्य
वाद संख्या: फर्स्ट अपील संख्या 48 / 2026
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 10 अगस्त, 2026
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