तलाक के बाद भी पत्नी का भरण-पोषण पति का जिम्मेदारी: हिमाचल हाई कोर्ट का नोटिस
हिमाचल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाक के बाद भी जब तक पत्नी दूसरी शादी नहीं करती, पति को उसे भरण-पोषण देना होगा। अदालत ने कहा कि पति वित्तीय संकट या ऋण चुकाने के बहाने भरण-पोषण से भाग नहीं सकते।

सौजन्य से:- जागरण
'तलाक के बाद भी पत्नी का भरण-पोषण पति का कानूनी दायित्व', हिमाचल हाई कोर्ट की टिप्पणी- जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते
हिमाचल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाक के बाद भी जब तक महिला दूसरी शादी नहीं करती, पति को उसे भरण-पोषण देना होगा। अदालत ने पति की याचिका खारिज कर ...और पढ़ें
मुख्य बातें
- तलाकशुदा पत्नी को दूसरी शादी तक भरण-पोषण का अधिकार।
- पति उम्र या वित्तीय संकट का बहाना नहीं बना सकता।
- कानून का उद्देश्य महिलाओं को बेसहारा होने से बचाना है।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पारिवारिक कानून और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला का विवाह तलाक के जरिए समाप्त भी हो चुका हो, तब भी जब तक वह दूसरी शादी नहीं कर लेती, तब तक पूर्व पति उसे भरण-पोषण देने के वैधानिक दायित्व से बच नहीं सकता।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर व न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने हमीरपुर के फैमिली कोर्ट के आदेश के विरुद्ध पति सुरजीत की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
1997 में हुआ विवाह, 2009 में घर से निकाला
याचिकाकर्ता सुरजीत व प्रतिवादी सावित्री देवी का विवाह 21 दिसंबर 1997 को हुआ था। वैवाहिक जीवन में प्रताड़ना और क्रूरता के कारण सावित्री देवी को वर्ष 2009 में घर से निकाल दिया। इसके बाद उन्होंने फैमिली कोर्ट हमीरपुर में तलाक और गुजारे भत्ते की याचिका दायर की। 22 नवंबर 2021 को क्रूरता के आधार पर उनके तलाक की डिक्री मंजूर हो गई।
फैमिली कोर्ट ने दिया भरण पोषण का आदेश
23 जनवरी 2024 को फैमिली कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह सावित्री देवी को याचिका दायर करने की तिथि (18.05.2019) से ₹प्रति माह 4,000 भरण-पोषण राशि का भुगतान करे।
हाई कोर्ट में दी चुनौती
पति ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उसका कहना था कि दोनों का तलाक हो चुका है, इसलिए उनका कानूनी और आपसी रिश्ता समाप्त हो गया है और वह भरण-पोषण देने के लिए उत्तरदायी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि धारा 125 के स्पष्टीकरण के तहत पत्नी शब्द में वह महिला भी शामिल है, जिसका तलाक हो चुका है और जिसने दोबारा विवाह नहीं किया है। सावित्री देवी अविवाहित है, इसलिए उसका यह अधिकार है।
पति का तर्क
पति का कहना था कि वह मजदूरी करता है, उसकी उम्र बढ़ चुकी है और खराब स्वास्थ्य के कारण वह कमाने में असमर्थ है, जबकि पत्नी सिलाई कर अच्छा कमा लेती है। पति ने पत्नी की आय का कोई पुख्ता सबूत नहीं दिया।
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जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते
साथ ही रिकार्ड से पता चला कि पति ने एक बिजनेस लोन लिया था, जो साबित करता है कि वह मजदूर नहीं, बल्कि ठेकेदार था। कोर्ट ने कहा कि स्वस्थ और सक्षम शरीर वाले पति को हर हाल में पत्नी का भरण-पोषण करना होगा। वित्तीय संकट या ऋण चुकाने के बहाने वह इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को बेसहारा होने और दर-दर भटकने से बचाना है ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। फैमिली कोर्ट की ओर से तय की गई ₹4,000 रुपये की राशि वर्तमान समय के अनुसार न्यायसंगत और संतुलित है।
न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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