होममुकदमेमद्रास हाई कोर्ट ने 80 वर्षीय पिता के भरण‑पोषण के अधिकार को खारिज किया
मुकदमे

मद्रास हाई कोर्ट ने 80 वर्षीय पिता के भरण‑पोषण के अधिकार को खारिज किया

मद्रास हाई कोर्ट ने 80 वर्षीय गोयल के बेटे सूरज से 75,000 रुपये के भरण‑पोषण की माँग को रद्द कर दिया। पिता ने अपनी किराये की आय छिपाई है, इसलिए वे भरण‑पोषण के हकदार नहीं हैं। यह निर्णय CRPC की धारा 125 के तहत लागू होता है।

24 सितंबर 2026 को 12:04 pm बजे
मद्रास हाई कोर्ट ने 80 वर्षीय पिता के भरण‑पोषण के अधिकार को खारिज किया

सौजन्य से:- ETV Bharat

भारत में भरण-पोषण के कानून, दावा करने का अधिकार और बच्चों की जिम्मेदारियां, जानें

भरण-पोषण कानून उन लोगों को वित्तीय सहायता और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में अहम भूमिका निभाते हैं जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं.

Published : September 24, 2026 at 5:02 PM IST

हैदराबाद: मद्रास हाई कोर्ट ने एक मामले में अपनी राय दी है, जिसमें कहा गया है कि बुढ़ापे में किसी व्यक्ति को परिवार के सहारे की कमी की भरपाई किसी भी पैसे से नहीं की जा सकती. चेन्नई के रहने वाले 80 वर्षीय गोयल, जो घरेलू उपकरण बनाने का व्यवसाय करते थे, ने अपने बेटे सूरज द्वारा अनदेखी किए जाने के बाद चेन्नई फैमिली वेलफेयर कोर्ट में भरण-पोषण के खर्च की मांग करते हुए एक मामला दर्ज कराया था. सूरज ने एक विलेख (deed) के तहत उनका घर खरीदा था, लेकिन बाद में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया था.

फैमिली वेलफेयर कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की और गोयल के बेटे सूरज को भरण-पोषण खर्च के रूप में 75,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था. सूरज ने इस आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए मद्रास हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी.

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस सुंदर मोहन ने फैमिली वेलफेयर कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत, अकेले रह रहे पिता को कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, अधिकार के रूप में गुजारा भत्ता (भरण-पोषण खर्च) मांगने का अधिकार नहीं है. चूंकि पिता गोयल ने अपनी अन्य संपत्तियों से होने वाली किराये की आय को छुपाया है, इसलिए वे गुजारा भत्ता पाने के हकदार नहीं हैं.

भरण-पोषण कानून उन व्यक्तियों को वित्तीय सहायता और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं. भारत में, इन कानूनों को पत्नियों, बच्चों और माता-पिता जैसे कमजोर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने और उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी साधन प्रदान करने के लिए बनाया गया है. भारत में भरण-पोषण कानून विभिन्न अधिनियमों द्वारा शासित होते हैं.

- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 (पूर्व में CrPC, 1973)

- हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956

- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955

- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005

ये कानून बिना किसी भेदभाव के दूसरों पर निर्भर व्यक्तियों के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता सुनिश्चित करते हैं, चाहे उनका लिंग या आयु कुछ भी हो. भारतीय अदालतों ने कामकाजी महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी है, जिससे अलग रह रही पत्नियों को सहायता का दावा करने की अनुमति मिलती है, भले ही उनकी आय खुद के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त न हो. हिंदू कानून के प्रावधान विशेष रूप से हिंदू पत्नियों, बेटियों और माताओं के अधिकारों और पात्रता की रक्षा करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं. ये कानून बिना लिंग भेद के दूसरों पर निर्भर लोगों की भलाई और अधिकारों को सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.

बीएनएसएस की धारा 144 (पूर्व में CrPC की धारा 125): भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार

BNSS की धारा 144 एक ऐसा प्रावधान है जो उन विशिष्ट श्रेणियों के लोगों को भरण-पोषण प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करता है जो अपना भरण-पोषण खुद से करने में असमर्थ हैं. यह पत, पिता और बच्चों सहित लोगों की कानूनी जिम्मेदारी है कि वे अपने आश्रितों को वित्तीय मदद दें. बीएनएसएस की धारा 144 का मुख्य उद्देश्य उन लोगों की भलाई और बेहतरी को सुनिश्चित करना है जो विभिन्न परिस्थितियों की वजह से खुद का गुजारा नहीं कर सकते.

- BNSS की धारा 144(1)(a) के तहत पत्नी भरण-पोषण का दावा कर सकती है.

- भारतीय बहुसंख्यक अधिनियम, 1875 की धारा 144(1)(b) के तहत एक नाबालिग भरण-पोषण का दावा कर सकता है.

- धारा 144(1)(d) के अनुसार, अगर माता या पिता / माता-पिता अपना भरण-पोषण खुद नहीं कर सकते, तो वे अपनी संतान से भरण-पोषण खर्च का दावा करने के हकदार हैं.

- उसकी वैध या अवैध संतान (शादीशुदा बेटी को छोड़कर) जो बालिग (18 वर्ष की आयु) हो गई है, जहां ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट के कारण अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती.

धारा 125 के अनुसार, अगर पर्याप्त साधन वाला कोई व्यक्ति अपने ऐसे पिता या माता का भरण-पोषण करने में उपेक्षा करता है या मना करता है जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, तो प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट ऐसी उपेक्षा या मनाही के साबित होने पर ऐसे व्यक्ति को आदेश दे सकता है कि वह अपनी पत्नी या ऐसे बच्चे, पिता या माता के भरण-पोषण के लिए ऐसी मासिक दर पर मासिक भत्ता दे और ऐसी कार्यवाही का खर्च वहन करे जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे और उसे ऐसे व्यक्ति को भुगतान करे जैसा कि मजिस्ट्रेट समय-समय पर निर्देशित करे.

सीआरपीसी की धारा 125 कहती है कि माता और पिता दोनों, चाहे वे जैविक हों या गोद लिए हुए (दत्तक), अपनी किसी भी संतान से भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं. धारा 125 के तहत बेटियां भी अपनी मां और पिता को भरण-पोषण देने के लिए उत्तरदायी हैं. सौतेली मां के मामले में, वह भरण-पोषण का दावा तभी कर सकती है जब वह विधवा हो और उसका अपना कोई जैविक बेटा या बेटी न हो. विवाहित बेटियां भी माता-पिता को भरण-पोषण देने के लिए उत्तरदायी हैं अगर माता-पिता पूरी तरह से उन पर निर्भर हों.

भरण-पोषण का दावा करने के लिए जरूरी शर्तें

पिता या माता अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हों: धारा 125(1)(d) में इस्तेमाल भाषा का सीधा मतलब यह है कि सिर्फ दो ही ऐसी परिस्थितियां हैं जिनके तहत माता-पिता भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं, जो कि इस प्रकार हैं:

माता-पिता अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ होने चाहिए

कोर्ट द्वारा सीआरपीसी की धारा 125 के तहत जिसके खिलाफ आदेश पारित किया जाता है, उसके पास अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त साधन या संसाधन होने चाहिए और फिर भी वह उनका भरण-पोषण करने में लापरवाही बरतता है या इनकार करता है.

धारा 125 का नियम व्यापक रूप से लागू होने वाला प्रावधान है. यह नियम उस दायित्व को कानूनी मान्यता देता है कि पर्याप्त साधन रखने वाला पुत्र अपने उस पिता या माता का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है जो खुद से अपना भरण-पोषण नहीं कर सकते हैं.

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955: इस अधिनियम के तहत, धारा 24 तलाक की कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान किसी भी जीवनसाथी द्वारा भुगतान किए जाने वाले अंतरिम गुजारा भत्ता का प्रावधान करती है. धारा 25 स्थायी गुजारा भत्ता और भरण-पोषण भत्ता से संबंधित है, जिसे अदालत तलाक की डिक्री (आदेश) देने के समय दे सकती है.

हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956, हिंदू महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकारों और हकदारी को नियंत्रित करता है. इस अधिनियम की धारा 18 में कहा गया है कि एक हिंदू पत्नी अपने विवाह के दौरान अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार है.

व्यक्तिगत विधि (संशोधन) अधिनियम, 2019: इसके तहत भारत में 'हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम' सहित अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में कई संशोधन किए गए. इसने कानूनों से लिंग-विशिष्ट भाषा को हटा दिया और लिंग की परवाह किए बिना भरण-पोषण के प्रावधानों को दोनों जीवनसाथियों पर समान रूप से लागू कर दिया.

विशेष विवाह अधिनियम, 1954: इस धर्मनिरपेक्ष कानून की धारा 36, जो भारत में विवाह करने वाले सभी लोगों पर लागू होती है, यह प्रावधान करती है कि अगर पत्नी के पास खुद का भरण-पोषण करने की वित्तीय क्षमता नहीं है, तो वह भरण-पोषण और कानूनी खर्चों का दावा करने की हकदार है. स्थायी गुजारा भत्ता पति द्वारा पत्नी को उसके जीवन भर के भरण-पोषण के लिए किया जाने वाला एकमुश्त भुगतान है.

भारत में घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 एक अन्य महत्वपूर्ण कानून है जो घरेलू हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं को जरूरी सुरक्षा और सहायता प्रदान करता है. इस अधिनियम की धारा 17 और 19 महिलाओं को एक "साझा घर" (shared household) में रहने का दावा करने का अधिकार देती हैं, भले ही उस घर पर उनका कानूनी मालिकाना हक न हो.

विशेष परिस्थितियां: हिंदू पुरुषों के लिए भरण-पोषण

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 तलाक (विवाह विच्छेद) की कार्यवाही के दौरान भरण-पोषण देने के मामले में लैंगिक रूप से तटस्थ है, यानी एक पति भी अपनी पत्नी से भरण-पोषण का दावा कर सकता है. हालांकि, यह कुछ शर्तों के अधीन है और पति को भरण-पोषण का दावा करने के लिए "योग्य पुरुष" (Deserving Man) होना चाहिए, जिसका निर्णय अंततः अदालतों को करना होता है. "योग्य पुरुष" होने के लिए कानून द्वारा अनिवार्य शर्तें निम्नलिखित हैं:

- आय के स्वतंत्र स्रोत का अभाव

- कमाने में शारीरिक या मानसिक असमर्थता

- कमाई की क्षमता का जानबूझकर त्याग न करना

- पत्नी के पास पर्याप्त आय होना

- पति और पत्नी का जीवन स्तर

पर्सनल लॉ के तहत बच्चों की माता-पिता का भरण-पोषण करने की बाध्यता

हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956

हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 भारत का पहला पर्सनल लॉ कानून है, जो बच्चों पर अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी तय करता है. माता-पिता के भरण-पोषण की यह जिम्मेदारी सिर्फ बेटों तक सीमित नहीं है, बल्कि बेटियों पर भी अपने माता-पिता के भरण-पोषण की उतनी ही जिम्मेदारी और कर्तव्य है. यह ध्यान रखना चाहिए कि जो माता-पिता किसी भी स्रोत से अपना भरण-पोषण करने में आर्थिक रूप से असमर्थ हैं, सिर्फ वे ही इस अधिनियम के तहत भरण-पोषण का दावा करने का हक रखते हैं. हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20 के अनुसार, वृद्ध और असमर्थ माता-पिता का भरण-पोषण करना बच्चों का दायित्व है (यहां बच्चों में वैध और अवैध दोनों संतानें शामिल हैं).

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, धारा 26 : अधिनियम के तहत कार्यवाही के दौरान, कोर्ट नाबालिग बच्चों की कस्टडी (संरक्षण), भरण-पोषण और शिक्षा के संबंध में आदेश पारित कर सकती है. इस अधिनियम के तहत, माता-पिता दोनों (पिता और माता दोनों या उनमें से कोई एक) अदालत के आदेशानुसार बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए जिम्मेदार हैं. ऐसे आदेश देते समय, अदालत यथासंभव बच्चों की इच्छाओं को ध्यान में रखती है. अदालत द्वारा ऐसे आदेशों और प्रावधानों में समय-समय पर संशोधन किया जा सकता है. अधिनियम के तहत कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा के संबंध में किसी भी आवेदन पर, प्रतिवादी को नोटिस तामील होने की तारीख से 60 दिनों के भीतर, यथासंभव निर्णय लिया जाना चाहिए.

मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3: एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने उन बच्चों के जन्म की संबंधित तारीखों से दो साल की अवधि के लिए उचित और निष्पक्ष प्रावधान तथा भरण-पोषण की हकदार है, जो उससे पैदा हुए हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बच्चे तलाक से पहले पैदा हुए थे या बाद में, पूर्व पति भरण-पोषण का भुगतान करने के लिए बाध्य है. अगर पूर्व पति पर्याप्त कारण बताए बिना मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश का पालन करने में विफल रहता है, तो उसे एक साल तक की जेल हो पड़ सकती है.

माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 4 - माता-पिता, चाहे वे जैविक, दत्तक या सौतेले पिता या सौतेली मां हों, चाहे वे वरिष्ठ नागरिक हों या नहीं या दादा-दादी/नाना-नानी, जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, अपने एक या अधिक वयस्क बच्चों (पुत्र, पुत्री, पोत्र/नाती और पोत्री/नातिन, जिसमें नाबालिग शामिल नहीं हैं) से भरण-पोषण का दावा करने के हकदार हैं. बच्चों का अपने माता-पिता के भरण-पोषण का दायित्व माता-पिता की ऐसी आवश्यकताओं तक विस्तृत है जो उन्हें सामान्य जीवन जीने में सक्षम बनाती हैं.

इसके अतिरिक्त, यह अधिनियम 60 साल या उससे अधिक आयु के निसंतान वरिष्ठ नागरिकों के उनके रिश्तेदारों द्वारा भरण-पोषण का भी प्रावधान करता है. 'रिश्तेदार' से तात्पर्य निसंतान वरिष्ठ नागरिक के ऐसे किसी भी कानूनी उत्तराधिकारी से है जो उसकी संपत्ति पर कब्जा रखते हैं या उसकी मृत्यु के बाद उसे विरासत में पाएंगे, लेकिन इसमें कोई नाबालिग शामिल नहीं है.

यह भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट: ससुर की मौत के बाद विधवा हुई हिंदू बहू को उनकी संपत्ति से गुज़ारा भत्ता पाने का हक

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →
सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा डीएम मामले में रोक को सीमित किया, हाईकोर्ट की सख्ती और मुआवजे के आदेश पर ही लागू
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा डीएम मामले में रोक को सीमित किया, हाईकोर्ट की सख्ती और मुआवजे के आदेश पर ही लागू

सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों की सुविधाओं में अंतर खत्म: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एकसमान नीति बनाने का आग्रह
मुकदमे

सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों की सुविधाओं में अंतर खत्म: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एकसमान नीति बनाने का आग्रह

नोएडा डीएम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रोक को सीमित किया, सिर्फ हाईकोर्ट की सख़्ती और मुआवजे के आदेश पर
मुकदमे

नोएडा डीएम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रोक को सीमित किया, सिर्फ हाईकोर्ट की सख़्ती और मुआवजे के आदेश पर

फिल्म सितारों को 'कोई भी कानून से ऊपर नहीं'—मुंढे ने राष्ट्रपति की सार्वजनिक स्वास्थ्य अपील को समर्थन
मुकदमे

फिल्म सितारों को 'कोई भी कानून से ऊपर नहीं'—मुंढे ने राष्ट्रपति की सार्वजनिक स्वास्थ्य अपील को समर्थन

कोरबा में 12 दिसंबर को आयोजित होगी नेशनल लोक अदालत
मुकदमे

कोरबा में 12 दिसंबर को आयोजित होगी नेशनल लोक अदालत

सेलिब्रिटीज़ नहीं कर सकते स्वास्थ्य‑विज्ञापनों पर कानून को नज़रअंदाज़, FDA आयुक्त तुकाराम मुंढ़े ने दी कड़ी चेतावनी
मुकदमे

सेलिब्रिटीज़ नहीं कर सकते स्वास्थ्य‑विज्ञापनों पर कानून को नज़रअंदाज़, FDA आयुक्त तुकाराम मुंढ़े ने दी कड़ी चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने डीएम मेधा रूपम को अकेले उत्तरदायी नहीं माना, 5 लाख रुपये के जुर्माने पर रोक
मुकदमे

सुप्रीम कोर्ट ने डीएम मेधा रूपम को अकेले उत्तरदायी नहीं माना, 5 लाख रुपये के जुर्माने पर रोक

कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर लोकतंत्र के हमले का आरोप, आंतरिक झगड़े की रिपोर्टें उजागर
मुकदमे

कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर लोकतंत्र के हमले का आरोप, आंतरिक झगड़े की रिपोर्टें उजागर

ताज़ा ख़बरें