दहेज की चाहत पारिवारिक वर्ग से लेकर आर्थिक स्तर तक किसी को भी प्रभावित करती है: दिल्ली हाई कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि दहेज उत्पीड़न एक सामाजिक समस्या है जो सभी पारिवारिक वर्गों और आर्थिक स्तरों पर प्रभावित करती है। 1998 में पत्नी रोशन की हत्या के मामले में सिराजुद्दीन को उम्रकैद की सजा प्रभावी ही रही क्योंकि अदालत ने रोशन द्वारा दिए गए बयानों को विश्वसनीय माना। अदालत ने यह भी पाया कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार भी दहेज की मांग का शिकार होते हैं और इससे उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
- जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने 18 जून के फैसले में 1998 में पत्नी रोशन की हत्या के दोषी सिराजुद्दीन की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
- कोर्ट ने कहा कि परिवार की गरीबी इस बात का प्रमाण नहीं है कि दहेज की मांग नहीं की गई होगी, बल्कि यह दिखाती है कि मांगें पूरी न होने से पीड़िता पर लगातार दबाव और उत्पीड़न हुआ।
- मामले के अनुसार, 26 सितंबर 1998 को आरोपी ने कथित तौर पर पत्नी पर केरोसिन डालकर आग लगा दी।
- मौत से पहले रोशन ने डॉक्टर, पुलिस और एसडीएम के सामने अलग-अलग मौकों पर अपने बयानों में एक जैसी बात कही कि उसके पति ने ही उसे आग लगाई।
- हाई कोर्ट ने इन बयानों को विश्वसनीय माना।
- कोर्ट ने कहा, दहेज जैसी सामाजिक बुराई हर तबके में मौजूद
- कई बार गरीब परिवार ही इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं
'दहेज की चाहत किसी वर्ग की मोहताज नहीं', दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखी पत्नी की हत्या के दोषी की उम्रकैद
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि दहेज की मांग केवल संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं होती। कोर्ट ने पत्नी रोशन की हत्या के मामले में सिराजुद्दीन की उम्रकैद बरकरार रखते हुए माना कि गरीब परिवार भी दहेज उत्पीड़न की गंभीर कीमत चुकाते हैं।
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