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संसद से पारित: सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक

शुक्रवार को संसद ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक पारित कर दिया। इस विधेयक के तहत उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रावधान है। विपक्षी दलों ने इस विधेयक पर चर्चा के दौरान हंगामा किया था। जजों की संख्या बढ़ने से मामलों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है।

5 अगस्त 2026 को 09:16 pm बजे
संसद से पारित: सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक

सौजन्य से:- Hindustan

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक संसद से पास

नई दिल्ली में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के विधेयक को संसद से मंजूरी मिल गई है। राज्यसभा में विधेयक पर हंगामे के बीच चर्चा हुई। विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों पर नारेबाजी की। कानून मंत्री ने विधेयक को न्यायिक सुधार का हिस्सा बताया और न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि को मामलों के त्वरित निपटारे के लिए आवश्यक बताया।

नोट... पहले यह खबर एजेंसी से जारी की गई थी। --------------------------------

- लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी पारित

- विपक्षी दल लगातार करते रहे हंगामा

नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश समेत न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के प्रावधान वाले विधेयक को संसद से मंजूरी मिल गई है। बुधवार को राज्यसभा ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को चर्चा के बाद ध्वनिमत से लौटा दिया। लोकसभा इस विधेयक को पहले ही पारित कर चुकी है।

विपक्ष द्वारा हंगामा

उच्च सदन की बैठक दो बार स्थगन के बाद दोपहर दो बजे शुरू हुई तो कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को चर्चा के लिए पेश किया। इस दौरान कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के सदस्य राम मंदिर चढ़ावा चोरी और दिल्ली में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर नारेबाजी कर रहे थे। उपसभापति हरिवंश ने हंगामा कर रहे सदस्यों से अपनी सीटों पर बैठने का आग्रह करते हुए विधेयक पर चर्चा में शामिल होने को कहा, लेकिन हंगामा नहीं थमा।

विधेयक पर चर्चा

हंगामे के बीच ही उपसभापति ने विधेयक पर चर्चा शुरू कराई, जिसमें विभिन्न दलों के सदस्यों ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान कांग्रेस सहित विपक्ष के विभिन्न दलों ने सदन से बहिर्गमन किया। बाद में तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, माकपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि दलों के सदस्य सदन में वापस आ गए और उन्होंने चर्चा में भाग भी लिया।

तेजी से निपटेंगे मामले : मेघवाल

विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए मेघवाल ने कहा कि यह विधेयक न्यायिक क्षेत्र में सुधार शृंखला की कड़ी है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से मामलों के निपटारे में तेजी आएगी। उन्होंने कहा कि 1950 में जब सुप्रीम कोर्ट की शुरुआत हुई थी, उस समय मुख्य न्यायाधीश सहित न्यायाधीशों की कुल संख्या आठ थी, जो अब बढ़कर 38 हो गई है। इससे पहले 2019 में उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी।

वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़े :

चर्चा में विभिन्न दलों के सदस्यों ने न्यायिक सुधारों को समय की मांग बताया। साथ ही निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या और न्यायपालिका में वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात कही। आम आदमी पार्टी के संजय सिंह और राजद के संजय यादव ने एससी-एसटी के प्रतिनिधत्व का मामला उठाया। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करती बल्कि कॉलेजियम करता है इसलिए जो नाम भेजे जाते हैं, वही सरकार करती है।

आपराधिक मामलों में बढ़ती आवश्यकता

आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि देश में जिस तरह से अपराध बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए अदालतों की हालत में सुधार किया जाना चाहिए। अवसंरचना को अत्याधुनिक बनाया जाना चाहिए और न्यायाधीशों की संख्या भी बढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिला अदालतों में पांच करोड़, उच्च न्यायालयों में 60 से 65 लाख और उच्चतम न्यायालय में 96 हजार मामले लंबित हैं।

राष्ट्रीय जनता दल के संजय यादव ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए अखिल भारतीय न्यायिक प्रणाली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी न्यायाधीशों की नियुक्ति किसी परीक्षा के आधार पर नहीं बल्कि कॉलेजियम व्यवस्था से होती है।

कांग्रेस के विवेक तन्खा ने कहा कि सरकार ने यह विधेयक लाने में जल्दबाजी की। उन्होंने जानना चाहा कि क्या उच्चतम न्यायालय को पूरा सम्मान दिया जाता है और क्या न्यायालय द्वारा दिए गए सभी आदेशों का पालन किया गया है?

भाजपा की संगीता यादव ने कहा कि अदालतों में लंबित मामलों को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना बेहतर कदम है ताकि जल्दी सुनवाई हो सके। कई मामले तो दस साल से अधिक समय से लंबित हैं। उन्होंने कहा कि न्याय समय पर न मिले तो वह निर्रथक हो जाता है। इस विधेयक के कानून बनने पर न्याय समय पर मिलना सुनिश्चित होगा।

तृणमूल कांग्रेस की मेनका गोस्वामी ने कहा कि एक बड़ी समस्या यह है कि न्यायपालिका में महिलाओं की नियुक्ति नहीं होती। उन्होंने कहा कि सभी उच्च न्यायालय में 30 फीसदी रिक्तियां हैं और महिला न्यायाधीशों की संख्या केवल 14 फीसदी है।

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