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केरल हाई कोर्ट ने तलाक कानून में बदलाव की मांग को खारिज किया, कहा संसद को कानून में संशोधन करने की जरूरत है

केरल हाई कोर्ट ने तलाक अधिनियम, 1869 के कुछ प्रावधानों को बदलने की कोशिश करने से इनकार कर दिया जिससे ईसाई पत्नी अपने वर्तमान निवास स्थान पर तलाक की अर्ज़ी दाखिल कर सकें। अदालत ने कहा कि केवल संसद कानून में संशोधन कर सकती है और तलाक कानून में बदलाव के लिए अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। अदालत ने संसद से ईसाई महिलाओं के हित में इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है।

5 जुलाई 2026 को 11:23 pm बजे
केरल हाई कोर्ट ने तलाक कानून में बदलाव की मांग को खारिज किया, कहा संसद को कानून में संशोधन करने की जरूरत है

सौजन्य से:- Court Book

केरल हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अदालतें तलाक अधिनियम, 1869 के स्पष्ट प्रावधानों में अपनी ओर से नए शब्द जोड़कर यह व्यवस्था नहीं कर सकतीं कि ईसाई पत्नी अपने वर्तमान निवास स्थान की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा बदलाव केवल संसद ही कानून में संशोधन करके कर सकती है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि इस विषय पर संसद को गंभीरता से विचार करना चाहिए ताकि ईसाई महिलाओं को भी वही सुविधा मिल सके जो अन्य वैवाहिक कानूनों के तहत महिलाओं को प्राप्त है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता की तलाक याचिका फैमिली कोर्ट, कल्पेट्टा ने यह कहते हुए लौटा दी थी कि डिवोर्स एक्ट, 1869 की धारा 3(3) के अनुसार उसे मामले की क्षेत्राधिकार (jurisdiction) प्राप्त नहीं है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि घरेलू हिंसा के कारण उसे अपना वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा और वह फिलहाल अपने माता-पिता के साथ रह रही है। ऐसे में उसे उस जिले में जाकर मुकदमा दायर करने के लिए मजबूर करना, जहां विवाह हुआ था या जहां पति-पत्नी अंतिम बार साथ रहे थे, उसके लिए अत्यंत कठिन है।

उसने हाई कोर्ट से अनुरोध किया कि धारा 3(3) की ऐसी व्याख्या की जाए जिससे पत्नी अपने वर्तमान निवास वाले जिले की फैमिली कोर्ट में भी तलाक याचिका दाखिल कर सके। उसका तर्क था कि हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम में यह सुविधा उपलब्ध है, लेकिन ईसाई महिलाओं को इससे वंचित रखना समानता के अधिकार के विपरीत है।

न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने कहा कि डिवोर्स एक्ट की धारा 3(3) की भाषा पूरी तरह स्पष्ट है और उसमें किसी प्रकार की अस्पष्टता नहीं है। इसलिए अदालत उसके शब्दों में परिवर्तन या नए शब्द जोड़कर उसका अर्थ नहीं बदल सकती।

अदालत ने कहा, "किसी कानून में नए शब्द जोड़ना विधायिका (संसद) का कार्य है। अदालतें कानून बनाने के क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकतीं।"

कोर्ट ने बताया कि वर्तमान कानून के अनुसार तलाक की याचिका केवल उसी अदालत में दायर की जा सकती है जहां विवाह संपन्न हुआ हो, जहां पति-पत्नी साथ रह रहे हों या जहां वे अंतिम बार साथ रहे हों। पत्नी के वर्तमान निवास स्थान को अतिरिक्त क्षेत्राधिकार के रूप में शामिल करना न्यायिक व्याख्या नहीं बल्कि विधायी संशोधन होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष को मुकदमा चलाने में वास्तविक कठिनाई हो, तो वह सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 के तहत मामले को एक सक्षम अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग कर सकता है। परिस्थितियां उचित होने पर अदालत ऐसा आदेश देने के लिए स्वतंत्र है।

हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि मांगी गई राहत न्यायिक व्याख्या के माध्यम से नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे कानून में नया प्रावधान जोड़ना पड़ेगा, जो अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

हालांकि, अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह आश्चर्यजनक है कि हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम में पत्नी को उसके निवास स्थान पर याचिका दायर करने की सुविधा देने के बावजूद डिवोर्स एक्ट, 1869 में ऐसा प्रावधान अब तक नहीं जोड़ा गया है। कोर्ट ने कहा कि संसद को ईसाई महिलाओं के हित में इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

इसी उद्देश्य से अदालत ने अपने निर्णय की प्रति कानून एवं न्याय मंत्रालय को भेजने का भी निर्देश दिया।

Case Details

Case Title: XXX v. Union of India & Ors.

Case Number: WP(C) No. 8801 of 2025

Judge: Justice Bechu Kurian Thomas

Decision Date: 30 June 2026

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