कोचिंग सेक्टर पर कानून बनाने की तैयारी में केंद्र सरकार, लेकिन समस्या का समाधान नहीं
कोचिंग सेक्टर पर कानून बनाने की तैयारी में केंद्र सरकार है, लेकिन लेखक का मानना है कि समस्या का समाधान नहीं हो पाएगा क्योंकि सीटों की कमी और दांव की भयावहता ही समस्या का मूल कारण है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सीटों की होड़: इंजीनियरिंग और मेडिकल में सीटें बिल्कुल नहीं हैं, ऐसा कहना गलत होगा। सरकारी और निजी संस्थानों में लगातार सीटें बढ़ी हैं। लेकिन, लोग कुल सीटों की नहीं, 'विश्वसनीय' और जीवन बदलने वाली सीटों की गणना करते हैं। यही इस मुद्दे का अर्थशास्त्रीय केंद्र है। कोचिंग सामान्य शिक्षा-बाजार नहीं, यह एक 'रैंक-टूर्नामेंट' है।
आगे निकलना अहम: NEET-UG में 22-23 लाख स्टूडेंट्स में से बमुश्किल 55-60 हजार को मनचाही सरकारी सीटें मिल पाती हैं। जब कुछ सौ रैंक ऊपर-नीचे होने से संस्थान, शाखा और जीवन की संभावनाएं बदल सकती हैं, तब लोग एक-एक रैंक सुधारने के लिए भारी निवेश करते हैं। यह Positional Competition है। इसमें फायदा दूसरों से आगे निकलने में है, न कि सीखने में।
वेरिफिकेशन से सुधरे सिस्टम
- परीक्षा कैसी भी हो, पहुंच जाएगा कोचिंग बाजार
- चीन भी ट्यूशन उद्योग को खत्म नहीं कर पाया है
- उच्च शिक्षा की कमियों को दूर करने की जरूरत
CUET का अनुभव: इसी वजह से परीक्षाओं को कम कोचेबल बनाना एक व्यावहारिक लक्ष्य नहीं है। CUET का अनुभव सामने है। इसे स्कूल-आधारित प्रवेश-व्यवस्था के रूप में लाया गया था। लेकिन, जल्द ही इसका अपना कोचिंग बाजार खड़ा हो गया।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव: चीन में 2021 की 'डबल रिडक्शन पॉलिसी' के तहत ट्यूशन उद्योग पर लगभग पूरी पाबंदी लगा दी गई थी। नतीजा, दिखने वाला कोचिंग उद्योग तो सिमट गया, पर मांग खत्म नहीं हुई। अब केवल संपन्न परिवार ही महंगे, अनियमित ट्यूशन का इंतजाम कर पाते हैं। साफ है कि दांव जितने बड़े होंगे, कोचिंग बाजार पहुंच जाएगा।
संसाधनों का अंतर: डमी स्कूलिंग को भी इसी ढांचे में समझना होगा। यह केवल अनुशासनहीनता नहीं, स्कूलों और कोचिंग उद्योग के बीच की 'संसाधन और श्रम विषमता' का परिणाम है। बड़े कोचिंग संस्थान शिक्षकों को स्कूलों की तुलना में कई गुना ज्यादा वेतन देते हैं। जब तक यह वित्तीय असंतुलन बना रहेगा, केवल 'बायोमीट्रिक हाजिरी' से स्कूलों की साख वापस नहीं लौटेगी।
भरोसे की कमी: समिति की 'पारदर्शिता' और 'संस्थागत भरोसा' बढ़ाने की बातें भी तब तक अधूरी हैं, जब तक हमारा वेरिफिकेशन सिस्टम ही सवालों में है। संस्थानों के मूल्यांकन पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। फरवरी 2025 में CBSE ने NAAC की निरीक्षण समिति के अध्यक्ष समेत सात सदस्यों को रिश्वत लेकर कॉलेजों को ऊंची रेटिंग देने के आरोप में गिरफ्तार किया था। जब मान्यता देने वाली संस्था भरोसे के संकट से जूझ रही हो, तो सिर्फ 'पारदर्शिता बढ़ाओ' का नियम काम नहीं करेगा।
कुछ सुझाव: पहला उपाय है कि कॉलेजों के अपने दावों पर निर्भर रहने के बजाय, छात्रों के रोजगार का वास्तविक डेटा देखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी कॉलेज से पास होने वाले कितने छात्रों का EPFO खाता खुला, यानी उन्हें औपचारिक नौकरी मिली, या वे टैक्स योग्य वेतन पा रहे हैं। यह ऐसा डेटा है, जिसमें कॉलेज हेरफेर नहीं कर सकते।
दूसरा उपाय: सरकार केवल नई इमारतें खड़ी करने के बजाय, मेधावी और जरूरतमंद छात्रों को सीधे फंड दे सकती है, जिसका उपयोग वे पहले से स्थापित भरोसेमंद निजी विश्वविद्यालयों में कर सकें। एक और उपाय है CSR फंड का रणनीतिक उपयोग।
असल चुनौती: समिति ने एक बेहद अहम मुद्दे को उठाया है, और इसके लिए सरकार की सराहना होनी चाहिए। लेकिन, अगर असली मकसद बच्चों का तनाव घटाना है, तो सिर्फ कोचिंग उद्योग को नियंत्रित करना काफी नहीं होगा। असली चुनौती है सीटों की कमी, दांव की भयावहता और सत्यापन तंत्र पर घटता भरोसा। जब तक इन तीनों पर एक साथ प्रहार नहीं होता, कोचिंग सिर्फ अपना पता और रूप बदलती रहेगी, अपना असर नहीं खोएगी।
(लेखक विमल कुमार IIT कानपुर के इकॉनमिक्स डिपार्टमेंट और वाधवानी स्कूल ऑफ AI में प्रोफेसर हैं)
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