सुप्रीम कोर्ट ने महिला को नौकरी से वंचित करने को नारीत्व का अपमान कहा
सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन आयल कॉर्पोरेशन द्वारा महिला को योग्य होते हुए भी एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी न देने को नारीत्व का अपमान मानते हुए 12 लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया। न्यायालय ने कंपनी के शारीरिक मेहनत के आधार पर महिला को अस्वीकृति के तर्क को खारिज कर दिया और मध्यस्थता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

सौजन्य से:- Hindustan
महिला होने पर नौकरी न देना नारीत्व का अपमान : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने महिला होने के कारण इंडियन आयल कॉर्पोरेशन (आईओसीएल) में नौकरी नहीं दिए जाने को नारीत्व का अपमान बताया है। न्यायालय ने लैंगिक भेदभाव पर 12 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। महिला ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है, जो सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुँच चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महज महिला होने के आधार पर एक महिला को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन आयल कॉर्पोरेशन (आईओसीएल) में नौकरी नहीं दिए जाने को ‘नारीत्व का अपमान’ बताया है। लैंगिक आधार पर योग्य होने के बाद भी एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रीफिलिंग हेल्पर की नौकरी नहीं देने पर इंडियन आयल कार्पोरेशन आड़े हाथ लेते हुए कहा कि सोच बदलने की जरूरत है।
न्यायालय का आदेश
जस्टिस अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने लैंगिक भेदभाव के चलते योग्य होने के बाद भी नौकरी से वंचित रखने पर इंडियन आयल को याचिकाकर्ता महिला (सुमित्रा) को 12 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। पीठ ने कहा कि चूंकि महिला अब सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी है, इसलिए यह अदालत उसके साथ हुए भेदभाव के लिए मुआवजा देना बेहतर उचित समझती है। सुनवाई के दौरान जस्टिस कुमार ने आईओसीएल से कहा आपने सिर्फ इसलिए महिला को नौकरी देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह महिला है? यह नारीत्व का अपमान है। उन्होंने कहा कि अब वह सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी है, लेकिन उसने लगातार अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी है। ऐसे में एकमुश्त मुआवज दिया जाए। उन्होंने कहा कि हम भारत से हैं और हर दिन हम कहते हैं कि महिलाओं का सम्मान करें और वे देवी के समान हैं। हम कह सकते हैं कि यह नारीत्व का अपमान है और वह भी भारत सरकार के एक उपक्रम द्वारा। शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि महिलाएं रोजाना अपने घरों में गैस सिलेंडर उठाती हैं। जब पुरुष नहीं होते, तो वही गैस सिलेंडर बदलती हैं। पीठ ने महिला को समान अवसर नहीं देने के लिए इंडियन आयल कंपनी की आलोचना की।
कंपनी की प्रतिक्रिया
आईओसीएल की ओर से पेश अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नियुक्ति के लिए नामों की सूची सिर्फ एक सिफारिश थी और यह अनिवार्य नहीं थी। अधिवक्ता ने पीठ से कहा कि अधिकारियों को वह उपयुक्त नहीं लगी होगी क्योंकि इस नौकरी में शारीरिक मेहनत की जरूरत होती है। हेल्पर को एलपीजी सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और नाइट शिफ्ट में भी ड्यूटी करनी होती है। इस पर पीठ ने कहा कि आप (कंपनी) यह सोचते हैं कि महिला सिलेंडर नहीं उठा सकती? यदि आप यह सोचते हैं तो इसे बदलने की जरूरत है।
मध्यस्थता का अनुरोध
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की उस मांग को सिरे से ठुकरा दिया, जिसमें इस मामले में आदेश पारित करने के बजाए, मध्यस्थता के लिए भेजने का आग्रह किया था। इस मामले में, याचिकाकर्ता सुमित्रा ( हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली) उन 49 लोगों में शामिल थी, जिनकी सिफारिश डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली एक स्थानीय समिति ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए की थी। वह कैजुअल खलासी/प्यून/रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू में शामिल हुई थी, लेकिन उसे नौकरी नहीं दी गई, जबकि 43 अन्य उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र मिले।
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