सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु को हिंदी शिक्षा पर अपना रुख बदलने का संकेत, जावाहर नवोदय विद्यालयों के लिये 3 महीने की समय सीमा दी
कोर्ट ने बताया कि राज्य को नवोदय विद्यालयों की स्थापना हेतु आवश्यक जमीन की पहचान में देरी न करनी चाहिए और इस कार्य के लिये तीन महीने अतिरिक्त समय दिया गया है। साथ ही, राज्य को हिंदी पढ़ाने के बारे में अपने पूर्व दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने की नसीहत दी गई, जबकि अगली सुनवाई 14 दिसंबर को निर्धारित है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
तमिलनाडु में हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी ? तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से अपना रवैया बदलने की बात कही है।
नई दिल्ली : तमिलनाडु की राजनीति में हिंदी बनाम तमिल का मुद्दा हावी रहा है। अब राज्य में जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) खोलने के विवाद के साथ अब भाषा नीति, राज्य की शिक्षा नीति और संघीय सहयोग के कानूनी सवालों से जुड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट में थलपति विजय की राज्य सरकार का कहना है कि नवोदय विद्यालयों की तीन-भाषा व्यवस्था तमिलनाडु की दो भाषा नीति और Tamil Learning Act, 2006 से टकराती है। दूसरी ओर, केंद्र का पक्ष है कि गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में नवोदय विद्यालयों की भाषा व्यवस्था स्थानीय भाषा और अंग्रेजी को ध्यान में रखती है। 17 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम मेरिट तय करने के बजाय बातचीत और पहले दिए गए निर्देश के अनुपालन पर जोर दिया।
'तमिलनाडु सरकार' हिंदी के प्रति रवैया बदले : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एजी मसीह की पीठ 17 सितंबर 2026 को तमिलनाडु की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के नवोदय विद्यालय स्थापित करने संबंधी निर्देश को चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्य को हिंदी पढ़ाने के मुद्दे पर अपना नजरिया बदलना चाहिए।जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी, ऐसा रवैया नहीं हो सकता और सरकार को नसीहत दी कि चेन्नई तथा दिल्ली को एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहिए। हालांकि पीठ का ऐसा कहना सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां हैं, अंतिम फैसला नहीं।
तमिलनाडु सरकार का मुख्य तर्क है कि नवोदय विद्यालयों की तीन-भाषा व्यवस्था राज्य की दो-भाषा नीति से मेल नहीं खाती। राज्य ने Supreme Court में यह भी कहा है कि Tamil Learning Act, 2006 के तहत तमिल को राज्य के स्कूलों में पढ़ाया जाना आवश्यक है और नवोदय मॉडल को मौजूदा राज्य की नीतियों के अनुरूप ढाले बिना लागू नहीं किया जा सकता।
केंद्र और राज्य की शिक्षा नीतियों के तालमेल का विवाद
जवाहर नवोदय विद्यालयों को लेकर विजय सरकार का 'टालमटोल'
दरअसल, दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय स्थापित करने के लिए आवश्यक जमीन की पहचान करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार ने बाद में इस आदेश को वापस लेने की मांग की, लेकिन 17 सितंबर की सुनवाई में कोर्ट ने उस मांग को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने साफ किया कि फिलहाल राज्य से जमीन खरीदने या अधिग्रहण करने को नहीं कहा गया है, बल्कि सही जमीन की पहचान करने को कहा गया है। जिसके लिए राज्य को अब तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया है।
नवोदय की 'भाषा व्यवस्था' पर केंद्र सरकार का क्या कहना है ?
मामले में गौर करने वाली बात है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में नवोदय विद्यालयों में कक्षा VI से VIII तक पढ़ाई क्षेत्रीय भाषा या अंग्रेजी में होती है। उच्च कक्षाओं में विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और मानविकी जैसे विषय अंग्रेजी में पढ़ाए जाते हैं। केंद्र का यह पक्ष तमिलनाडु की उस आशंका के संदर्भ में रखा गया था कि नवोदय विद्यालयों का मॉडल अनिवार्य रूप से हिंदी को शिक्षा का प्रमुख माध्यम बना देगा।
थलपति विजय सरकार को 3 महीने में लेना है एक्शन, फिर आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के सामने दो प्रमुख प्रश्न दिखाई देते हैं। पहला , राज्य की वैधानिक भाषा नीति के साथ केंद्रीय शिक्षा योजना का तालमेल और दूसरा, केंद्र और राज्य संबंधों में सहयोग का दायरे की बात का।
कोर्ट ने राज्य को पहले दिए गए जमीन की पहचान संबंधी निर्देश का पालन करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया है और अगली सुनवाई 14 दिसंबर को तय की है।
अभी तो यही कहना सही होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर को तत्काल अंतिम फैसला सुनाने के बजाय केंद्र और तमिलनाडु के बीच आगे बातचीत की संभावना खुली रखी है। इसका मतलब है कि फिलहाल नवोदय विद्यालयों की स्थापना का अंतिम कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अभी लंबित है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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