सुप्रीम कोर्ट ने माँ के बांग्लादेश निर्वासन पर केंद्र को जवाब‑देने का नोटिस जारी किया
एक बेटे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की स्थायी निवासी माँ को गैर‑कानूनी तरीके से बांग्लादेश भेजे जाने के आरोप को सुना और केंद्र सरकार को चार हफ्ते में जवाब देने का नोटिस दिया। कोर्ट ने 2025 के SOP और इमिग्रेशन ऑर्डर की वैधता पर भी सवाल उठाते हुए, बिना संवैधानिक सुरक्षा के निर्वासन की प्रक्रिया को चुनौती दी।

सौजन्य से:- ETV Bharat
महिला को गैरकानूनी तरीके से भेजा बांग्लादेश, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
महिला को गैरकानूनी तरीके से बांग्लादेश भेजे जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है.
Published : September 17, 2026 at 9:38 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बेटे की याचिका पर नोटिस जारी किया. बेटे ने आरोप लगाया है कि उसकी मां को पश्चिम बंगाल की स्थायी निवासी होने और उसके दादा का नाम 1952 के मतदाता सूची में होने के बावजूद गैर-कानूनी तरीके से बांग्लादेश भेज दिया.
यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना की बेंच के सामने आया. बेंच ने केंद्र को नोटिस जारी किया और चार हफ्ते में जवाब मांगा. सीनियर एडवोकेट एस मुरलीधर और एडवोकेट प्रसन्ना एस साहिन अख्तर की ओर से पेश हुए, जिन्होंने अपनी मां को हिरासत में लेने और भारत से जबरदस्ती बांग्लादेश भेजने को भी चुनौती दी थी.
याचिका में 2 मई, 2025 के मानक संचालन प्रक्रिया, जिसका टाइटल "गैर-कानूनी बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्याओं के निर्वासन की प्रक्रिया" (SOP) और इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स ऑर्डर, 2025 है, की कानूनी मान्यता को भी चुनौती दी गई है. क्योंकि यह कानून और संविधान द्वारा तय सुरक्षा उपायों के बिना भारत के अंदर पकड़े गए लोगों को निकालने की इजाजत देता है या उसे आसान बनाता है.
याचिका में कहा गया कि महिला हमेशा से कानूनी तौर पर भारत में मौजूद रही है. उसने कभी भी गैर-कानूनी तरीके से देश में दाखिल नहीं हुई हैं. याचिका में कहा गया कि उसे गलत तरीके से और जबरदस्ती उस देश से निकाला गया, जिसकी वह हमेशा से सही मायने में ताल्लुक रखती थी.
याचिका में यह भी कहा गया है कि महिला गोविंदपुर, नॉर्थ 24 परगना, पश्चिम बंगाल की स्थायी निवासी है. उसकी भारतीय पहचान और पश्चिम बंगाल के साथ लंबे समय से उसका जुड़ाव उसकी पहचान और नागरिक दस्तावेज और पुराने चुनावी रिकॉर्ड से साबित होता है. उसके दादा बादसा गाजी का नाम 1952 के मतदाता सूची में है.
जबकि उसके माता-पिता के नाम 2002 के मतदाता सूची में है. याचिका में कहा गया है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान उसका नाम बाद में मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से हटा दिया गया था. चूंकि इस नाम को हटाने को सक्षम ट्रिब्यूनल के सामने चुनौती दी गई है. इसलिए यह उसकी राष्ट्रीयता तय करने का आधार नहीं बनता है.
याचिका में दावा किया गया कि महिला लगभग 20 साल पहले अपने पति के साथ रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई गई थी. वहां वह घरेलू कामगार के तौर पर काम करती थी. याचिका में कहा गया है कि 19 जुलाई, 2026 को उसे मुंबई में कुछ लोगों ने खुद को पुलिस वाला बताकर रोका. उसके बाद उन्हें जबरदस्ती पकड़ा और डिटेंशन सेंटर ले गए.
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