सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना की याचिका पर होगी सुनवाई, पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न केंद्रस्थान पर है
सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना की एक याचिका पर सुनवाई होगी, जिसमें चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को 'असली शिवसेना' माना गया है और उन्हें पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न सौंपा गया है। शिवसेना की ओर से सीनियर वकील कपिल सिबल ने दलील दी है कि चुनाव आयोग के फैसले गैर-कानूनी हैं और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए।

सौजन्य से:- ETV Bharat
उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट से कहा: विधायी विभाजन पार्टी का विभाजन नहीं है
इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना की पीठ ने की.
By Sumit Saxena
Published : August 12, 2026 at 7:58 AM IST
नई दिल्ली: उद्धव ठाकरे गुट ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि विधायी विंग (पार्टी के चुने हुए प्रतिनिधियों का समूह) में बंटवारे को अकेले ही राजनीतिक पार्टी में बंटवारा नहीं माना जा सकता. साथ ही, उन्होंने कहा कि भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को 'असली शिवसेना' के तौर पर मान्यता देकर और उसे 'धनुष-बाण' का चुनाव चिह्न आवंटित करके गैर-कानूनी काम किया है.
इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने की. बेंच के सामने शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से सीनियर वकील कपिल सिबल ने अपनी दलीलें पेश की.
यह बेंच चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती देने वाली उद्धव ठाकरे गुट की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एकनाथ शिंदे के गुट को 'असली शिवसेना' माना गया और पार्टी का नाम व चुनाव चिह्न उन्हें सौंप दिया गया. सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 29A के तहत चुनाव आयोग के पास यह तय करने का अधिकार नहीं है कि पहले से रजिस्टर्ड किसी राजनीतिक पार्टी का आंतरिक संविधान लोकतांत्रिक है या अलोकतांत्रिक.
सिब्बल ने कहा कि धारा 29A मुख्य रूप से राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन को नियंत्रित करती है और इसके तहत दलों को संविधान तथा समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति निष्ठा की पुष्टि करनी होती है. सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले का कड़ा विरोध किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि यह मानना गैर-कानूनी है कि विधायी दल में विभाजन का मतलब राजनीतिक दल में भी विभाजन है, और इसलिए इस फैसले को रद्द किया जाना चाहिए.
यह तर्क दिया गया कि विभाजन मूल राजनीतिक दल के भीतर ही होना चाहिए और उसके बाद ही एक-तिहाई विधायक एक अलग समूह बना सकते हैं. उन्होंने दलील दी कि एक फैसले में इस मुद्दे पर विचार किया गया था और कोर्ट ने उस तर्क को खारिज कर दिया था कि विधायक दोहरी भूमिका निभाते हैं. एक अपनी मूल राजनीतिक पार्टी के सदस्य के तौर पर और दूसरी विधायी पार्टी के सदस्य के तौर पर.
सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग ने दो फैसलों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि विधायी पार्टी में विभाजन के कारण राजनीतिक पार्टी में भी विभाजन हुआ है. उन्होंने कहा, 'लेकिन इनमें से कोई भी फैसला इस बात का समर्थन नहीं करता है.' उन्होंने कहा कि इसलिए, विवादित आदेश - जो केवल विधायी विंग में विभाजन के आधार पर 'सिंबल ऑर्डर' के तहत अधिकार क्षेत्र का दावा करता है 'गैर-कानूनी है और इसे रद्द किया जाना चाहिए'.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने मुख्य रूप से दोनों गुटों की अलग-अलग बैठकों, विरोधी गुट के विधायक दल के नेताओं और मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) की नियुक्ति, और विधायकों को अयोग्य ठहराने की कार्यवाही से जुड़ी जानकारी पर भरोसा किया.
सिब्बल ने चुनाव आयोग के उस फैसले को भी चुनौती दी जिसमें उसने शिवसेना के 2018 के संविधान को अलोकतांत्रिक बताकर नजरअंदाज कर दिया था. उन्होंने बताया कि शिंदे गुट के सदस्यों ने खुद उसी संविधान के तहत पद और फ़ायदे हासिल किए थे.
सिब्बल ने जोर देकर कहा कि भले ही 2018 के संविधान को अलोकतांत्रिक मान भी लिया जाए, तो भी इससे पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न विरोधी गुट को सौंपने को सही नहीं ठहराया जा सकता. इस मामले की सुनवाई आज भी जारी रहेगी.
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