सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन चलाने के नियमों पर कार्रवाई करने का फैसला किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैलेट गन चलाने वाले नियम तैयार किए जाएंगे। याचिकाकर्ताओं ने सरकार से सिफारिश की है कि पैलेट गन नागरिकों पर इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए

सौजन्य से:- Hindustan
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By Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट भीड़ नियंत्रण में पैलेट गन के इस्तेमाल पर कड़ा प्रोटोकॉल बनाएगा। दिल्ली में छात्र प्रदर्शन के दौरान छर्रे लगने के मामले में SC में याचिका दाखिल कर पैलेट गन पर पूरी तरह रोक की मांग की गई है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान पैलेट गन चलाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई चल रही है। देश की शीर्ष अदालत ने कहा है कि वह पैलेट गन चलाने को लेकर गाइडलाइन तैयार करेगी। अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आम नागरिकों पर पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की गई है।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह याचिका पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद और दो अन्य लोगों (प्रशांत कुमार सिंह और शेख इरशाद मंसूरी) की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। बीते 20 जुलाई को परीक्षा के पेपर लीक के मुद्दे पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की तरफ से दिल्ली में 'संसद चलो' मार्च का आयोजन किया गया था।
याचिका के मुताबिक, इसी प्रदर्शन के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने अचानक पंप-एक्शन गन से फायर कर दिया। आरएएफ द्वारा दागे गए पैलेट (छर्रों) से प्रशांत और इरशाद घायल हो गए। शरीर में धंसे छर्रों के कारण उन्हें तुरंत तेज दर्द और ब्लीडिंग होने लगी। इसके बाद दोनों घायलों को लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, जहां सर्जरी के जरिए छर्रों को बाहर निकाला गया। याचिका में इन दोनों घायलों के लिए मुआवजे की भी मांग की गई है।
पैलेट गन तो आपने ही कश्मीर में शुरू किया; जब इंजीनियर राशिद ने राहुल को घेरा
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने अदालत में दलील दी कि दिल्ली पुलिस को पैलेट गन के इस्तेमाल का अधिकार देने वाला कोई भी स्थायी आदेश मौजूद नहीं है। ग्रोवर ने कोर्ट में बताया, "मैंने इस विषय पर गहरी रिसर्च की है। 1967 से लेकर अब तक किसी भी आदेश या नियम में पैलेट गन के इस्तेमाल का कोई जिक्र नहीं है।"
उन्होंने तर्क दिया कि यह विशेष हथियार अपनी बनावट और प्रकृति से ही नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है। याचिका का यह मतलब नहीं है कि पुलिस के पास बचाव के लिए कुछ नहीं होना चाहिए, लेकिन यह हथियार इसके लिए सही नहीं है। कोर्ट को बताया गया कि पैलेट गन का इस्तेमाल 2010 और उसके बाद 2016 में कश्मीर में किया गया था। 2011 में एक यूनियन हाई टास्क फोर्स ने एसओपी बनाई थी और 2016 में एक हाई पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट भी आई थी, लेकिन वह रिपोर्ट अभी उपलब्ध नहीं है।
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इस अहम मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है।
केंद्र से हलफनामा मांगने की बात कहते हुए सीजेआई ने अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा, "हम उनका (केंद्र का) हलफनामा लेंगे और आपकी सहायता व विषय विशेषज्ञों की राय के साथ एक प्रोटोकॉल तय करना चाहेंगे कि क्या इसका इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं। अगर इसे अनुमति दी जाती है, तो किन परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल हो।" इस मामले को 20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ ही सूचीबद्ध किया गया है।
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याचिका में इस हथियार के खतरों को भी विस्तार से समझाया गया है। पैलेट गन मुख्य रूप से .12 बोर की पंप-एक्शन गन होती है। इसे एक सामान्य 'शॉटगन' राइफल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जिसके एक कारतूस में 250 से 400 तक छोटे मेटल के छर्रे होते हैं। चूंकि पैलेट गन से निकले छर्रे एक बड़े हिस्से को निशाना बनाते हैं, इसलिए भीड़ में मौजूद लोगों की आंखों और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर चोट पहुंचने की बहुत अधिक आशंका रहती है।
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