निराधार हुआ ‘ट्रिपल टेस्ट’: ‘उद्योग’ की परिभाषा और सुप्रीम कोर्ट का नजरिया
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की एक पीठ ने ‘बेंगलोर जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड (बीडब्ल्यूएसएसबी) बनाम ए. राजप्पा’ मामले (1978) में दी गयी व्यवस्था की दुरुस्तगी पर 20 अगस्त को एक फैसला सुनाया। तब के निर्णय में, जस्टिस वी.आर.…

सौजन्य से:- The Hindu
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की एक पीठ ने ‘बेंगलोर जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड (बीडब्ल्यूएसएसबी) बनाम ए. राजप्पा’ मामले (1978) में दी गयी व्यवस्था की दुरुस्तगी पर 20 अगस्त को एक फैसला सुनाया। तब के निर्णय में, जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (आईडी ऐक्ट) की धारा 2(जे) के तहत “उद्योग” किसे माना जाए, इसके लिए “ट्रिपल टेस्ट” तय किया था। किसी उद्योग के लिए तीन शर्तें पूरी होनी जरूरी थीं – व्यवस्थित क्रियाकलाप, नियोक्ता-कर्मचारी सहयोग, और विशुद्ध धार्मिक या आध्यात्मिक के अलावा दूसरी तमाम इन्सानी जरूरतें पूरी करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन/वितरण। मुनाफा कमाने का मकसद अप्रासंगिक था; इस निर्धारण में मायने रखती थी क्रियाकलाप की प्रकृति, और केवल “संप्रभु कामकाज” ही इस दायरे से बाहर थे। ‘उत्तर प्रदेश बनाम जयबीर सिंह’ मामले (2005) में पांच जजों की एक पीठ ने इस परिभाषा पर संदेह जताया और सात जजों की एक पीठ ने इसे नौ जजों की वर्तमान पीठ के पास भेजा। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली इस पीठ ने पुराने आईडी ऐक्ट – जिसे औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (आईआरसी) लागू होने पर 21 नवंबर, 2025 को समाप्त कर दिया गया - के तहत लंबित सभी विवादों के लिए ट्रिपल टेस्ट बरकरार रखा। हालांकि, नौ-सदस्यीय पीठ के बहुमत ने यह भी निर्णय दिया कि बीडब्ल्यूएसएसबी फैसला आईआरसी की धारा 2(पी) की व्याख्या के लिए “’शीट ऐंकर” यानी मुख्य आधार नहीं होगा। यह एक गलती है। अपनी असहमति वाली राय में, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि मामला बड़ी बेंच को भेजना (यानी रेफरेंस) ही अनावश्यक था और ट्रिपल टेस्ट में किसी दखलअंदाजी की जरूरत नहीं है — यह नजरिया तीन अन्य जजों का भी था। उनका तर्क बहुत दमदार है। साल 1978 से, और खास तौर पर 1991 के उदारीकरण और निजीकरण के सुधारों के बाद, कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में कर्मचारी निजी क्षेत्र में जा चुके हैं, और सरकारी रोजगार की सुरक्षा से बाहर हैं। लिहाजा, ट्रिपल टेस्ट में शामिल उद्योग की व्यापक परिभाषा अब कामगारों के सुरक्षा कवच के रूप में और भी जरूरी हो गयी है।
अब भी, आईआरसी की धारा 2(पी) बीडब्ल्यूएसएसबी फैसले में जस्टिस कृष्ण अय्यर के ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले से ज्यादा दूर नहीं गयी है और काफी हद तक उसकी मूल-भावना को ही दोहराती है। इसलिए यह समझना मुश्किल है कि जब खुद धारा 2(पी) की व्याख्या होनी है, तो क्यों बीडब्ल्यूएसएसबी फैसले को किनारे किया जाना चाहिए। ट्रिपल टेस्ट एक मजदूर-पक्षीय उपकरण भर नहीं था। उद्योग की व्यापक परिभाषा के साथ आईडी ऐक्ट की सुरक्षाएं ही नहीं आयीं, बल्कि उससे जुड़ी पाबंदियां भी आयीं — मसलन, नियोक्ता के वास्ते छंटनी और उद्योग बंद करने का एक नियमबद्ध रास्ता, और कर्मचारियों पर मनमर्जी से हड़ताल करने पर रोक। वास्तव में, ट्रिपल टेस्ट ने सिर्फ कामगार कल्याण के बजाय औद्योगिक शांति को संभव बनाया। आईआरसी से इस सिद्धांत को अलग कर देने से — जैसा कि बहुमत ने किया है — वह व्याख्यात्मक ढांचा ही खत्म हो गया है, जो ऐसे विवादों को सुलझाना संभव बनाता था। धारा 2(पी) में ट्रिपल टेस्ट की मूल-भावना की मौजूदगी को देखते हुए, अब यह सुनिश्चित करना अदालतों और ट्रिब्यूनलों की जिम्मेदारी है कि कानून के बदलाव को इरादे में बदलाव की तरह न देखा जाए, भले ही बहुमत के फैसले ने ऐसा करने का मुख्य आधार हटा दिया है।
Published - August 24, 2026 10:17 am IST
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