सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: असम के डिटेंशन कैंप में बंद दो महिलाओं के देश निकाले पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने असम के डिटेंशन कैंप में बंद दो महिलाओं के देश निकाले पर रोक लगा दी है, जिन्हें विदेशी नागरिक घोषित किया गया था। अदालत ने असम सरकार, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है और उनसे चार हफ्तों में जवाब मांगा है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
असम डिटेंशन कैंप मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दो महिलाओं के देश निकाले पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने असम सरकार, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है. अदालत ने चार हफ्तों में जवाब मांगा है.
By Sumit Saxena
Published : June 5, 2026 at 8:11 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को असम के डिटेंशन कैंप (हिरासत केंद्र) में बंद दो महिलाओं के देश निकाला (deportation) पर रोक लगा दी है. यह आदेश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की पीठ द्वारा पारित किया गया. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने असम सरकार, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है. अदालत ने उनसे चार हफ्तों के भीतर इस मामले पर जवाब मांगा है.
पीठ ने अपने आदेश में कहा, "नोटिस जारी करें, जो 16 जुलाई 2026 तक वापस आना चाहिए. इस बीच, आज की स्थिति को बनाए रखा जाएगा. याचिकाकर्ता यदि हिरासत में हैं, तो उन्हें अगली सुनवाई की तारीख यानी 16 जुलाई 2026 तक देश से बाहर नहीं निकाला जाएगा." इन महिलाओं की पहचान सालेहा खातून और सरभानु बेगम के रूप में हुई है. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील फुजैल अहमद अय्यूबी ने पैरवी की.
50 वर्षीय अनपढ़ महिला सरभानु बेगम, 2 मार्च 2026 से गोलपारा के डिटेंशन कैंप में बंद हैं. याचिका में दलील दी गई है कि दर्रांग के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा उन्हें विदेशी नागरिक घोषित किए जाने और गुवाहाटी हाई कोर्ट द्वारा उस फैसले को सही ठहराए जाने के बाद अब उन्हें देश से बाहर निकाला जा रहा है.
याचिका के अनुसार, उन्होंने ट्रिब्यूनल के सामने सबूत पेश किए थे कि वह भारतीय माता-पिता की बेटी हैं, जिनके नाम असम के नगांव जिले के एक गांव के 1971 से पहले के चुनावी रिकॉर्ड में दर्ज हैं.
उनकी याचिका में तर्क दिया गया कि उन्होंने अपनी लगातार रिहाइश और वंशावली को साबित करने के लिए कई दस्तावेजी सबूत पेश किए थे. इनमें उनके पिता के एनआरसी लेगेसी डिटेल्स, वोटर लिस्ट, गांव के मुखिया और ग्राम पंचायत द्वारा जारी लिंकेज सर्टिफिकेट, परिवार के चुनावी दस्तावेज और अपने भाई सहित स्वतंत्र गवाहों के मौखिक बयान शामिल थे.
याचिका में आगे कहा गया, "याचिकाकर्ता एक विधवा महिला है जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर पृष्ठभूमि से आती है. उसे केवल उन निष्कर्षों के आधार पर उसकी आजादी से वंचित कर दिया गया है और परिवार से अलग कर दिया गया है, जो स्पष्ट रूप से गलत, अत्यधिक तकनीकी कमियों वाले और मनमाने हैं."
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता अहसान अली और कोरपुलजान की बेटी हैं, जिनके नाम असम के नगांव जिले के नागाबांधा गांव के 1971 से पहले के चुनावी रिकॉर्ड या एनआरसी लेगेसी डेटा में दर्ज हैं.
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