पैगंबर मोहम्मद पर अपमानजनक टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, दायर PIL को नकारा
पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ता को पहले उचित प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराने की जरूरत है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत इस अधिकार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।

सौजन्य से:- Navbharat Times
पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मामले को सनसनीखेज बनाने की जरूरत नहीं हैं और न ही त्वरित सुनवाई की जरूरत है। याचिकाकर्ता को पहले उचित प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराने की जरूरत है।
नई दिल्ली: वैसे तो भारत में पाकिस्तान जैसा ईश-निंदा कानून नहीं है। लेकिन भारत का मुस्लिम समुदाय पैगंबर मोहम्मद पर बोलने से कई बार आहत हो जाता है। एक बार फिर इसी तरह का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है, जिसमें त्वरित सुनवाई की मांग की गई है। लेकिन पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मामले को सनसनीखेज बनाने की जरूरत नहीं हैं और न ही त्वरित सुनवाई की जरूरत है। याचिकाकर्ता को पहले उचित प्राधिकरण में शिकायत दर्ज कराने की जरूरत है।
यह मामला पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा है, जिसके बाद विभिन्न स्तरों पर विरोध और कानूनी कार्रवाई की मांग उठी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, इन्फ्लुएंसर नाज़िया इलाही खान ने जून में एक पॉडकास्ट के दौरान पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक कमेंट्स किए थे, जिसके वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर वायरल हो गए थे। इस घटना के बाद इन्फ्लुएंसर के खिलाफ कई FIR दर्ज की गईं। लेकिन केस करने वालों ने प्रोसेस और लोकल अथॉरिटीज़ को बायपास करके सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और याचिका के जरिए शीर्ष अदालत से तुरंत सुनवाई की मांग की।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की बेंच ने दायर PIL को तुरंत लिस्ट करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। न्यायालय ने किसी भी प्रकार की हिंसा या उकसावे से सहमति नहीं जतायी। याचिकाकर्ता को शीर्ष अदालत ने भारत के कानून पर भरोसा रखने की बात कही। ऐसे मामलों को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए। उन्हें पहले उचित प्राधिकरण में मामला दर्ज होने के बाद कार्रवाई का इंतजार करना चाहिए।
सिस्टम पर भरोसा रखें। हम तो बस शीर्ष अदालत हैं, हमारा काम निगरानी करना है। यह हमारे लिए भी आँखें खोलने वाली बात है कि क्या हमारे निचले स्तर के अधिकारी काम कर रहे हैं या नहीं?
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की बेंच की टिप्पणी
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक भावनाओं का संरक्षण
कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के संरक्षण के बीच संतुलन की संवैधानिक बहस सामने आई है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालांकि, अनुच्छेद 19(2) के तहत इस अधिकार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति का अधिकार किसी व्यक्ति या समुदाय की गरिमा और सामाजिक शांति को प्रभावित करने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी बयान से कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है तो संबंधित कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं।
मामले में एक बात गौर करने वाली है.. जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हर मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट में लाया जाएगा तो इससे निचली संस्थाओं की भूमिका कमजोर होगी। इससे जाहिर होता है कि शीर्ष अदालत निचली संस्थाओं को भी क्रियाशील देखना चाहती है। साथ ही यह भी समझा जा सकता है कि यह ऐसे मामलों के लिए एक सबक भी है कि हर मामले को सुलझाने के लिए एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया है, जिसका पालन किया जाना चाहिए।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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