सुप्रीम कोर्ट की उत्तराखंड हाईकोर्ट जज को फटकार, पूर्व क्लाइंट का केस सुनने पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक जज की आलोचना की है क्योंकि उन्होंने अपने पूर्व क्लाइंट से जुड़े एक मामले में सुनवाई की और आदेश पारित किए। कोर्ट ने कहा कि जज को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी और न्यायिक मर्यादा को ध्यान में रखना चाहिए।

सौजन्य से:- Bar and Bench
समाचारसुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के जज को अपने पूर्व क्लाइंट का केस सुनने के लिए फटकार लगाई
कोर्ट ने कहा कि जज को कंपनी का पहले प्रतिनिधित्व करने के बाद इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी, भले ही दोनों मामलों के मुद्दे अलग-अलग क्यों न हों।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक जज की आलोचना की है। उन्होंने एक ऐसे मामले में सुनवाई की और आदेश पारित किए, जिसमें शामिल कंपनी का वे पहले वकील के तौर पर प्रतिनिधित्व कर चुके थे [प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम पुनीत अग्रवाल और अन्य]।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने 27 जुलाई को दिए अपने आदेश में कहा,
"ऐसे हालात में, न्यायिक मर्यादा को ध्यान में रखते हुए, संबंधित जज को इस मामले पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी और न ही कोई आदेश पारित करना चाहिए था।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि जज अपने पुराने क्लाइंट्स से जुड़े मामलों की सुनवाई से बचें।
कोर्ट ने कहा, "यह बात सर्वविदित है कि न केवल न्याय होना चाहिए, बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। किसी पुराने क्लाइंट या प्राइवेट संस्था के पक्ष या विपक्ष में आदेश पारित करने से इस उद्देश्य को बढ़ावा नहीं मिलता।"
यह मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ी ज़मीन से जुड़ी क्रिमिनल रिट पिटीशन में पास किए गए अंतरिम आदेशों के एक बैच से सामने आया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह बताया गया कि हाईकोर्ट के जज पहले भी उसी ज़मीन के टुकड़े से जुड़े मुकदमे में कंपनी के वकील के तौर पर पेश हुए थे। कंपनी ने भी हाई कोर्ट में एक अर्जी दी थी जिसमें कार्रवाई में शामिल होने की मांग की गई थी, जो अभी भी पेंडिंग थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि अंतरिम आदेशों के ज़रिए रिट पिटीशन का दायरा उन मुद्दों से निपटने के लिए बढ़ा दिया गया था जो ओरिजिनल कार्रवाई का हिस्सा नहीं थे।
बेंच ने कहा कि भले ही यह अच्छे इरादों से किया गया हो, लेकिन यह उन रिट पिटीशन में अपनाने का सही तरीका नहीं था जो पूरी तरह से अलग मुद्दों पर दायर की गई थीं।
इसने कहा कि अगर जज को लगता कि मामले पर पब्लिक इंटरेस्ट में विचार करने की ज़रूरत है, तो वह इसे हाई कोर्ट की पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन कमेटी को भेज सकते थे या सही कार्रवाई के लिए चीफ जस्टिस के सामने रख सकते थे। हालांकि, कोर्ट ने इस स्टेज पर अंतरिम ऑर्डर में दखल देने से मना कर दिया, यह देखते हुए कि वे पहले से ही लागू थे और पेड़ न काटने का वादा किया गया था।
इसने निर्देश दिया कि मामले को हाई कोर्ट की एक सही बेंच के सामने रखा जाए, जो अंतरिम ऑर्डर की वैलिडिटी सहित सभी मुद्दों की नए सिरे से जांच करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि उसके ऑर्डर की एक कॉपी उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजी जाए ताकि मामलों की भविष्य की लिस्टिंग और अगर ज़रूरत हो तो पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन शुरू करने के बारे में सही कदम उठाए जा सकें।
पिटीशनर्स की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुक्ता गुप्ता के साथ एडवोकेट राहुल जैन, ललित मोहिनी भट, हेतु अरोड़ा सेठी, सिद्धार्थ अग्रवाल, सानिध्य कुमार, कनक बथवाल, नित्या गुप्ता और विट्ठल बाला सुब्रह्मण्यम ने पैरवी की।
रेस्पोंडेंट्स की तरफ से एडवोकेट वंशजा शुक्ला, दीप्ति आर्य, नारायण हर गुप्ता, समापिका बिस्वाल, अनमोल संधू, स्वाति आर्य, महक कुमार और विजय कसाना ने पैरवी की।
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Supreme Court pulls up Uttarakhand High Court judge for hearing former client’s case
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