आपके खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट या बदजुबानी, मानहानि का केस बनता है,जानें पूरी कानूनी प्रक्रिया
सोशल मीडिया पोस्ट, व्हाट्सएप मैसेज या सार्वजनिक मंचों पर लगाए गए झूठे आरोप किसी की सामाजिक और पेशेवर छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। पर डरने या घबराने की बात नहीं है, कानून आपकी प्रतिष्ठा का सम्मान रखवाना जानता है।…

सौजन्य से:- Navbharat Times
सोशल मीडिया पोस्ट, व्हाट्सएप मैसेज या सार्वजनिक मंचों पर लगाए गए झूठे आरोप किसी की सामाजिक और पेशेवर छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। पर डरने या घबराने की बात नहीं है, कानून आपकी प्रतिष्ठा का सम्मान रखवाना जानता है।
नई दिल्ली: अक्सर खबरों में नेताओं और अभिनेताओं से जुड़े मानहानि के मुकदमों और उसके फैसलों के बारे में जानकारी मिलती रहती है। लेकिन क्या हो जब आपको कोई, बदनाम करे। चुप तो नहीं रहेंगे...रहना भी नहीं चाहिए। कानून आपके सम्मान की रक्षा करता है। ऐसे मामलों में भारतीय कानून पीड़ित व्यक्ति को न्याय पाने का अधिकार देता है।
आज के डिजिटल दौर में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना पहले से कहीं आसान हो गया है। सोशल मीडिया पोस्ट, यूट्यूब वीडियो, व्हाट्सएप मैसेज या सार्वजनिक मंचों पर लगाए गए झूठे आरोप किसी की सामाजिक और पेशेवर छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। पर डरने या घबराने की बात नहीं है, कानून आपकी प्रतिष्ठा का सम्मान रखवाना जानता है।
मानहानि क्या है?
भारतीय कानूनों के अनुसार जब भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में ऐसा झूठा आरोप, बयान, लेख, वीडियो, पोस्ट या टिप्पणी देता है या प्रकाशित करता है, जिसकी वजह से दूसरे आदमी प्रतिष्ठा, मान-सम्मान को ठेस पहुंचे, नुकसान हो, तो इस मामले को मानहानि के मामले से जुड़ा माना जा सकता है। मानाहनि का यह अपराध बोलकर, लिखकर, तस्वीर, संकेत या अन्य तरह के सोशल या डिजिटल माध्यमों से भी किया जा सकता है। इस मामले में गौर करने वाली बात यह है कि हर तरह की आलोचना को मानहानि नहीं माना जाता। यदि कोई आलोचना या बात और एक बड़े नजरिए से सार्वजनिक हित में कही गयी है, तो वह मानहानि नहीं होगी ।
मानहानि से जुड़े कानून क्या हैं
देश में पहले भारतीय दंड संहिता की आईपीसी 1860 की धारा 499 और 500 के जरिए मानहानि को परिभाषित किया गया था। लेकिन भारत सरकार ने पुराने कानूनों की जगह 1 जुलाई 2024 से लागू हुए नए आपराधिक कानून, यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 को लागू कर दिया । इसमें भी मानहानि के प्रावधानों को रखा गया है। लेकिन नए कानूनों में पुराने आईपीसी की धारा 499 और 500 की जगह अब BNS की धारा 356 के तहत मानहानि को परिभाषित किया गया है।
मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने के लिए क्या सबूत जरूरी हैं
अदालत सबूत देखती है। कई बार लोग समझ न होने के कारण गलत मुकदमा भी करा देते हैं। मानहानि का केस को मजबूत बनाने के लिए और पक्ष में फैसला आए, इसके लिए पीड़ित व्यक्ति को यह साबित करना होता है कि उसके खिलाफ झूठी और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली बात कही या प्रकाशित की गई है। ऐसे में सबूतों का होना जरूरी है...मसलन
वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग
समाचार पत्र की कटिंग
व्हाट्सएप चैट
ईमेल या पत्र
गवाहों के बयान
सोशल मीडिया पोस्ट का स्क्रीनशॉट
मानहानि का मुकदमा कैसे दायर किया जाता है?
इसके लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति आरोपी को कानूनी नोटिस भेजना होता है। नोटिस मिलने पर झूठे आरोप वापस लेने या माफी मांगने की मांग कर सकता है।
लेकिन नोटिस भेजने के बाद भी यदि मामला नहीं सुलझता है तो संबंधित क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आपराधिक मानहानि की शिकायत दाखिल की जा सकती है।
यदि आप चाहें तो मान-सम्मान और प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के बदले हर्जाना मांगने के लिए सिविल कोर्ट में भी मुकदमा दायरकर सकते हैं।
कई मामलों में, जब आरोप और इल्जाम बड़े हों, तब आपराधिक और सिविल दोनों तरह की कार्रवाई एक साथ की जाती है।
मान-सम्मान और प्रतिष्ठा को लेकर एक बात तो साफ है। किसी के लिए भी यह सबसे मूल्यवान संपत्ति होती है। भारत के नए आपराधिक कानून, भारतीय न्याय संहिता बीएनएस 2023 में भी मानहानि के खिलाफ सुरक्षा बरकरार रखी गई है। यदि कोई व्यक्ति झूठे आरोप लगाकर या सोशल मीडिया के माध्यम से आपकी छवि को नुकसान पहुंचाता है, तो आप कानूनी नोटिस, सिविल दावा और आपराधिक शिकायत के जरिए न्याय प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए मेरी सलाह है कि ऐसे मामलों में जहां दिल पर चोट लगी है, कानून की शरण लेना ही सबसे मुफीद और सही रास्ता है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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