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एक बेटे की सेवा से दूसरे की जिम्मेदारी नहीं मिटती

अदालत ने फैसला सुनाया है कि यदि एक बेटा मां की देखभाल कर रहा है, तो इससे दूसरे बेटे की जिम्मेदारी नहीं समाप्त होती। संतान का यह कर्तव्य है कि वह अपनी मां की देखभाल की जिम्मेदारी उठाए। अदालत ने एक मामले में प्रतिवादी बेटे को अपनी मां को हर महीने 8 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।

9 जुलाई 2026 को 02:58 am बजे
एक बेटे की सेवा से दूसरे की जिम्मेदारी नहीं मिटती

सौजन्य से:- Amar Ujala

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एक बेटा सेवा कर रहा है तो दूसरे की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती : अदालत

Thu, 09 Jul 2026 07:35 AM IST

शिमला ब्यूरो

संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा

संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा

Updated Thu, 09 Jul 2026 07:35 AM IST

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धर्मशाला। यदि एक बेटा बुजुर्ग मां की सेवा कर रहा है तो इससे दूसरे बेटे की मां की देखभाल करने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो सकती। संतान का यह कर्तव्य है कि वह अपनी मां के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाए। प्रधान न्यायाधीश फैमिली कोर्ट डॉ. अरविंद मल्होत्रा की अदालत ने एक 82 वर्षीय बुजुर्ग महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है।

अदालत ने प्रतिवादी बेटे को आदेश दिए हैं कि वह याचिका दायर करने की तिथि से अपनी मां को जीवनकाल तक हर महीने 8 हजार रुपये गुजारा भत्ता दे। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि वृद्ध माता स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है तो उसकी देखभाल करना संतान का कानूनी दायित्व है।

नगरोटा बगवां क्षेत्र की रहने वाली बुजुर्ग महिला ने अदालत में याचिका दायर कर बताया था कि वर्ष 2018 में उन्हें लकवा (पक्षाघात) का दौरा पड़ा था। इसके बाद वे लंबे समय तक बिस्तर पर रहीं। वर्तमान में भी उनका उपचार चल रहा है और दवाओं व चिकित्सा पर हर महीने 25 से 30 हजार रुपये तक खर्च होता है।

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उन्होंने आरोप लगाया था कि उनका एक बेटा तो उनकी पूरी देखभाल कर रहा है, लेकिन दूसरे बेटे ने कभी भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई। याचिका में दावा किया गया था कि उक्त बेटे का अपना कारोबार है और उसकी मासिक आय एक लाख रुपये से अधिक है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बेटे की वास्तविक आय के संबंध में कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किए गए थे, इसलिए याचिकाकर्ता द्वारा बताई गई आय को हूबहू स्वीकार नहीं किया जा सकता।

वहीं, प्रतिवादी बेटा अदालत में केवल लिखित जवाब दाखिल करने के बाद गायब हो गया और आगामी सुनवाइयों के दौरान उपस्थित नहीं हुआ। इस पर अदालत ने उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई अमल में लाई। अदालत ने माना कि महिला वृद्ध हैं, बीमार हैं और अपनी आजीविका चलाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। साथ ही बेटे की तरफ से महिला के बयानों का कोई प्रभावी खंडन भी नहीं किया गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए फैमिली कोर्ट ने बुजुर्ग महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेटे को प्रति माह 8 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित किया।

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अदालत ने प्रतिवादी बेटे को आदेश दिए हैं कि वह याचिका दायर करने की तिथि से अपनी मां को जीवनकाल तक हर महीने 8 हजार रुपये गुजारा भत्ता दे। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि वृद्ध माता स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है तो उसकी देखभाल करना संतान का कानूनी दायित्व है।

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नगरोटा बगवां क्षेत्र की रहने वाली बुजुर्ग महिला ने अदालत में याचिका दायर कर बताया था कि वर्ष 2018 में उन्हें लकवा (पक्षाघात) का दौरा पड़ा था। इसके बाद वे लंबे समय तक बिस्तर पर रहीं। वर्तमान में भी उनका उपचार चल रहा है और दवाओं व चिकित्सा पर हर महीने 25 से 30 हजार रुपये तक खर्च होता है।

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उन्होंने आरोप लगाया था कि उनका एक बेटा तो उनकी पूरी देखभाल कर रहा है, लेकिन दूसरे बेटे ने कभी भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई। याचिका में दावा किया गया था कि उक्त बेटे का अपना कारोबार है और उसकी मासिक आय एक लाख रुपये से अधिक है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बेटे की वास्तविक आय के संबंध में कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किए गए थे, इसलिए याचिकाकर्ता द्वारा बताई गई आय को हूबहू स्वीकार नहीं किया जा सकता।

वहीं, प्रतिवादी बेटा अदालत में केवल लिखित जवाब दाखिल करने के बाद गायब हो गया और आगामी सुनवाइयों के दौरान उपस्थित नहीं हुआ। इस पर अदालत ने उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई अमल में लाई। अदालत ने माना कि महिला वृद्ध हैं, बीमार हैं और अपनी आजीविका चलाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। साथ ही बेटे की तरफ से महिला के बयानों का कोई प्रभावी खंडन भी नहीं किया गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए फैमिली कोर्ट ने बुजुर्ग महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बेटे को प्रति माह 8 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित किया।

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