इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो वकीलों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में फर्जी टाइप्ड कॉपी लगाकर अदालत से धोखाधड़ी करने वाले दो वकीलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने 24 मई 2024 के अपने पुराने आदेश को रद्द कर दिया और वकीलों के खिलाफ आईपीसी की धारा 199 के तहत जांच कराने का निर्देश दिया है.

सौजन्य से:- Hindustan
फर्जी टाइप्ड कॉपी लगाकर अदालत से धोखाधड़ी, हाई कोर्ट ने दो वकीलों के खिलाफ दिए कार्रवाई के निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायालय के साथ धोखाधड़ी कर राहत हासिल करने के एक मामले में सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने धोखाधड़ी के आधार पर हासिल किए गए 24 मई 2024 के अपने पुराने आदेश को रद्द कर दिया।
Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायालय के साथ धोखाधड़ी कर राहत हासिल करने के एक मामले में सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने धोखाधड़ी के आधार पर हासिल किए गए 24 मई 2024 के अपने पुराने आदेश को रद्द कर दिया और संबंधित वकीलों के खिलाफ सख्त कानूनी एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने बरेली विकास प्राधिकरण की रिव्यू अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया है।
बरेली जिले के दोहनिया गांव स्थित एक भूमि के 2/3 हिस्से के मुआवजे को लेकर रामपाल व चार अन्य ने याचिका दाखिल की थी। याचिका में विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी द्वारा घोषित अवार्ड के आलोक में ब्याज के भुगतान की मांग की गई थी। याचिका दाखिल करते समय मूल अवार्ड की जगह एक टाइप्ड कॉपी प्रस्तुत की गई।
2024 में बीडीए को दिया गया था भुगतान करने का आदेश
मूल अवार्ड में था कि अर्जित भूमि पर कब्जे के दिनांक से अभिनिर्णय तक नियमानुसार ब्याज देय होगा..."। और टाइप्ड कॉपी में फर्जी हिस्सा जोड़ा गया " अर्जित भूमि पर कब्जे के दिनांक से अभिनिर्णय के दिनांक तक प्रथम एक वर्ष के लिए नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज तथा शेष अवधि के लिए 15 प्रतिशत की दर से ब्याज देय होगा..."। कोर्ट ने इस टाइप्ड कॉपी को सही मानते हुए 24 मई 2024 को बीडीए को नौ प्रतिशत और 15 प्रतिशत की दर से ब्याज का भुगतान करने का आदेश कर दिया था। अभिलेखों की जांच के दौरान बरेली विकास प्राधिकरण को इस धोखाधड़ी का पता चला, जिसके बाद बीडीए ने आदेश को वापस लेने के लिए प्रार्थना पत्र दिया। याचिका लंबित रहने के दौरान ही रामपाल व अन्य के वकीलों ने अवमानना याचिका दाखिल कर बीडीए पर दबाव बनाया, जिसके कारण बीडीए को मजबूरन नौ प्रतिशत और 15 प्रतिशत की दर से ब्याज राशि का भुगतान करना पड़ा।
वकील ने मांगी माफी
आदेश वापसी पर सुनवाई के दौरान रामपाल व अन्य के वरिष्ठ अधिवक्ता ने इसे टाइप्ड कॉपी की अनजाने में हुई त्रुटि बताते हुए माफी की गुहार लगाई। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि मूल अवार्ड में जो दरें थीं ही नहीं, उन्हें खुद से जोड़ देना टाइपिंग की भूल नहीं बल्कि न्यायालय के साथ धोखाधड़ी और वकीलों की दुर्भावना है। कोर्ट ने कहा कि वकालत एक महान पेशा है लेकिन बार व बेंच की गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसी अनैतिक प्रथाओं में शामिल लोगों के साथ सख्ती से निपटना आवश्यक है। यह भी कहा कि पश्चाताप से उत्पन्न पछतावा और पकड़े जाने के बाद मिलने वाले दंड के डर में अंतर होता है। इसी के साथ कोर्ट ने 24 मई 2024 के अपने आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
रजिस्ट्रार जनरल को भी निर्देश
बीडीए को निर्देश दिया कि राजस्व अधिकारियों के माध्यम से लाभार्थियों को नौ प्रतिशत और 15 प्रतिशत दर से भुगतान की गई अतिरिक्त राशि की भू-राजस्व के बकाया की तरह तत्काल वसूली करे। साथ ही रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि अधिवक्ता शिवकांत मिश्र और कृष्णकांत मिश्र के खिलाफ आईपीसी की धारा 199 (झूठा साक्ष्य देने/प्रयुक्त करने) के तहत जांच कराकर संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत में शिकायत दर्ज कराएं। साथ ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया और यूपी बार कौंसिल में शिकायत दर्ज कराने का आदेश दिया ताकि इन अधिवक्ताओं के वकालत के लाइसेंस रद्द किए जा सकें।
लेखक के बारे में
Dinesh Rathourदिनेश राठौर वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल और प्रिंट
पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश ने अपने करियर की शुरुआत 2010 में हरदोई से की थी। कानपुर
यूनिवर्सिटी से स्नातक दिनेश ने अपने सफर में हिन्दुस्तान (कानपुर, बरेली, मुरादाबाद), दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका
(डिजिटल) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। हरदोई की गलियों से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर
आज डिजिटल मीडिया के शिखर तक पहुँच चुका है। दिनेश राठौर ने यूपी और राजस्थान के विभिन्न शहरों की नब्ज को प्रिंट और
डिजिटल माध्यमों से पहचाना है।
लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में कार्यरत दिनेश दिनेश, खबरों के पीछे की राजनीति और सोशल मीडिया के ट्रेंड्स (वायरल
वीडियो) को बारीकी से विश्लेषण करने के लिए जाने जाते हैं।
पत्रकारिता का सफर
हरदोई ब्यूरो से करिअर की शुरुआत करने के बाद दिनेश ने कानपुर हिंदुस्तान से जुड़े। यहां बतौर स्ट्रिंगर डेस्क पर करीब
एक साल तक काम किया। इसके बाद वह कानपुर में ही दैनिक जागरण से जुड़े। 2012 में मुरादाबाद हिंदुस्तान जब लांच हुआ तो
उसका हिस्सा भी बने। करीब दो साल यहां नौकरी करने के बाद दिनेश राजस्थान पत्रिका से जुड़ गए। सीकर जिले में दिनेश ने
करीब तीन साल तक पत्रकारिता की। उन्होंने एक साल तक डिजिटल का काम भी किया। 2017 में दिनेश ने बरेली हिंदुस्तान में
प्रिंट के डेस्क पर वापसी की। लगभग दो साल की सेवाओं के बाद डिजिटल हिंदुस्तान में काम करने का मौका मिला जिसका सफर जारी
है।
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
आईएएस अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में राज्य हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2016 के फैसले को रद्द किया, दीर्घकालिक आग नियंत्रण के लिए नई रणनीति की जरूरत

अस्पष्ट जमानत आदेशों पर दोबारा विचार करने की जरूरत नही, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की उत्तराखंड सरकार की अपील

केरल उच्च न्यायालय: खाली चेक देश का सैनिक, न करो मनोबल को गिराएं

भारत में चुनाव की निगरानी करने वाले अधिकारियों की नियुक्ति में सरकार का अधिकार सुप्रीम कोर्ट में जांच का विषय

केरल उच्च न्यायालय ने मनन कुमार मिश्रा के आदेश पर रोक लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने रूस-यूक्रेन संघर्ष में मारे गए 26 भारतीयों के परिवारों को मुआवजे और दाह संस्कार के लिए सौंपने के निर्देश दिए

बेटियों के अनुकंपा नियुक्ति पर रोक हटाने की नीति सही नहीं: सुप्रीम कोर्ट
ताज़ा ख़बरें
- सख्त अदालती आदेश: पुलिस को सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश
- मंत्रालय कैंटीन की स्वच्छता पर सवाल, बॉम्बे हाई कोर्ट ने वकीलों को जांच का आदेश दिया
- बड़ी खबर: उमर अब्दुल्ला और पत्नी पायल अब्दुल्ला अलग होने के लिए सहमत, सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर
- उमर अब्दुल्ला और पायल अब्दुल्ला के तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी
- सुप्रीम कोर्ट देगा स्पष्टीकरण: अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की रिपोर्ट कौन कर सकता है?
- उमर खालिद को जमानत दिलाने की कोशिश, दिल्ली उच्च न्यायालय ने जारी किया नोटिस
- भविष्य में पूजा, भविष्य में श्रद्धा और विश्वास का वज़न
- स्वैच्छिक सेवकों का प्रशिक्षण, लोगों को लोक अदालत के प्रति जागरूक करें

