सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिवालिया होने पर प्रमोटरों को नहीं मिलेगी राहत
रियल एस्टेट सेक्टर में दिवालिया प्रक्रिया से घर खरीदारों को बड़ी राहत मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिवालिया कंपनी के खिलाफ मुकदमे केवल कंपनी पर लागू होते हैं, जबकि प्रमोटरों और निदेशकों पर कानूनी कार्रवाई जारी रह सकती है।

सौजन्य से:- livehindustan.com
घर खरीदारों को राहत, दिवालिया कानून की आड़ नहीं ले सकेंगे प्रमोटर
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिवालिया कंपनी के खिलाफ मुकदमे केवल कंपनी पर लागू होते हैं, जबकि प्रमोटरों और निदेशकों पर कानूनी कार्रवाई जारी रह सकती है। अब घर खरीदार कंपनी के प्रमोटरों और निदेशकों के खिलाफ अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं। वकीलों का कहना है कि निर्णय से घर खरीदारों को राहत मिलेगी।
नई दिल्ली। घर खरीदारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी रियल एस्टेट कंपनी के दिवालिया होने पर दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता यानी आईबीसी के तहत मिलने वाली छूट या मोराटोरियम (धारा 14) केवल कंपनी पर लागू होगी, उसके मालिकों, प्रवर्तकों, निदेशकों, व्यक्तिगत गारंटर या अन्य संबंधित व्यक्तियों को इसका संरक्षण नहीं मिलेगा। इसका मतलब है कि घर खरीदार अब दिवालिया कंपनी के प्रमोटर और निदेशकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रख सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था मामला
मामले की सुनवाई
बंगलुरू के मंत्री मान्यता एनर्जिया प्रोजेक्ट में घर खरीदने वालों ने वर्ष 2023 में कंपनी के डेवलपर, उसके प्रमोटर, निदेशकों और अन्यों के खिलाफ राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग के पास गुहार लगाई थी। उनका कहना था कि कंपनी ने 31 दिसंबर 2018 तक कब्जा देने का वादा किया था लेकिन पूरा भुगतान मिलने के बाद भी उन्हें अपने घर नहीं मिले। इसके बाद कंपनी के दिवालिया प्रक्रिया में चली गई तब राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग ने आईबीसी की धारा 14 के मोराटोरियम के तहत मामले पर रोक लगा दी। इस फैसले के खिलाफ घर खरीदार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। आईबीसी की धारा 14 मोराटोरियम दिवाला प्रक्रिया के दौरान कंपनी के खिलाफ कानूनी और वसूली कार्रवाई पर रोक लगाती है।
कार्रवाई से छूट सिर्फ कंपनी को
मामले की सुनवाई के बाद 27 जुलाई को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आईबीसी की धारा 14 के तहत मिलने वाली रोक (मोराटोरियम) सिर्फ दिवालिया कंपनी पर लागू होती है। इसका लाभ तब तक कंपनी के प्रमोटर, निदेशक, सहायक कंपनी या व्यक्तिगत गारंटर को नहीं दिया जा सकता, जब तक कानून में इसका साफ तौर पर प्रावधान न किया गया हो। अदालत ने यह भी कहा कि कंपनी के खिलाफ कार्रवाई रोके जाने के बाद भी प्रमोटरों या निदेशकों की अपनी अलग कानूनी जिम्मेदारी बनती है, इससे उनके खिलाफ मुकदमा चलता रहेगा। पीठ ने कहा कि आयोग को सिर्फ कंपनी के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगानी चाहिए थी और बाकी पक्षों पर मामला जारी रखा जा सकता था।
घर खरीदारों के लिए राहत
इस फैसले के आलोक में वकीलों ने कहा कि अब स्पष्ट हो गया है कि यह धारा घर खरीदार कंपनी के प्रमोटरों और निदेशकों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई पर रोक नहीं लगा सकती। इस फैसले से उन्हें अपना पैसा या अधिकार वापस मिलने की संभावना बढ़ सकती है। दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड के 2022 के एक नोट के अनुसार, दिवाला कानून के तहत प्राप्त 5,785 शिकायतों में 43.9% शिकायतें घर खरीदारों की थीं, जो इस कानून के तहत सबसे बड़ा प्रभावित वर्ग हैं।
प्रमोटरों और रियल एस्टेट सेक्टर पर असर
यह फैसला प्रमोटरों की जवाबदेही बढ़ाता है, हालांकि उन्हें स्वतः जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। किसी भी मामले में उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी अदालत में साबित करनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का असर रियल एस्टेट से आगे अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ेगा, जहां कंपनियों के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया और प्रमोटरों के खिलाफ अलग कानूनी कार्रवाई साथ-साथ चलती है।
रियल एस्टेट में दिवालिया प्रक्रिया अलग क्यों
रियल एस्टेट क्षेत्र में दिवालिया प्रक्रिया ज्यादा कठिन होती है क्योंकि इसमें बैंक ही नहीं, हजारों घर खरीदार भी जुड़े होते हैं। सितंबर 2025 तक देश में रियल एस्टेट से जुड़े 221 दिवालिया मामलों में करीब 1.09 लाख घर खरीदार प्रभावित थे। अभी आईबीसी में किसी एक परियोजना के आधार पर दिवालिया समाधान का प्रावधान नहीं है। पूरी कंपनी के स्तर पर प्रक्रिया चलती है। इसी वजह से दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की एक समिति ने परियोजना-आधारित दिवालिया समाधान प्रणाली लागू करने की सिफारिश की है, ताकि अधूरे प्रोजेक्ट जल्द पूरे हों और घर खरीदारों के हितों की बेहतर सुरक्षा हो सके।
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