इमरजेंसी में क्या था मीसा कानून, जिसकी वजह से लालू ने अपनी बेटी का नाम रखा था मीसा?
1971 में भारत में बनाया गया मीसा कानून इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए उपयोग किया गया था। इसके तहत पुलिस ने हजारों लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें राजनीतिक नेता, छात्र नेता और पत्रकार शामिल थे।

सौजन्य से:- ABP News
MISA Law: इमरजेंसी में क्या था मीसा कानून, जिसकी वजह से लालू ने अपनी बेटी का नाम रखा था मीसा?
MISA Law: भारत में इमरजेंसी के दौरान एक ऐसा कानून था जो काफी ज्यादा विवादित रहा है. आइए जानते हैं क्या था यह कानून जिसके नाम पर लालू प्रसाद यादव ने अपनी बेटी का नाम रखा.
- मीसा कानून 1971 में आंतरिक सुरक्षा हेतु बनाया गया था।
- इमरजेंसी में मीसा ने हजारों लोगों को हिरासत में लिया।
- लालू यादव भी मीसा में जेल गए, बेटी नाम मीसा।
- आपातकाल के बाद 1977 में मीसा कानून रद्द हुआ।
MISA Law: भारत के राजनीतिक इतिहास में इमरजेंसी का दौर सबसे ज्यादा बहस वाले अध्यायों में से एक है. इमरजेंसी के उन 21 दिनों के दौरान मीसा नाम का एक कानून हजारों राजनीतिक नेताओं, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और विपक्षी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की वजह बना. दशकों बाद भी यह कानून न सिर्फ अपनी व्यापक शक्तियों के लिए याद किया जाता है बल्कि इस वजह से भी याद किया जाता है कि इसने राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपनी सबसे बड़ी बेटी का नाम मीसा भारती रखने के लिए प्रेरित किया था. आइए जानते हैं क्या था मीसा कानून.
क्या था मीसा कानून?
मीसा का पूरा नाम मेंटेनेंस ऑफ इंटरनेशनल सिक्योरिटी एक्ट था. यह कानून 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान संसद द्वारा बनाया गया था. इस एक्ट को आंतरिक सुरक्षा उपाय के तौर पर पेश किया गया था. इस एक्ट की मदद से अधिकारियों को उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की शक्ति मिली जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा या फिर सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा माना जाता था. हालांकि इमरजेंसी के दौरान यह कानून काफी ज्यादा विवादित हो गया था.
सरकार को मिली असाधारण शक्ति
मीसा के तहत पुलिस और सुरक्षा एजेंसी को सामान्य आपराधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना ही लोगों को गिरफ्तार करने और हिरासत में लेने का अधिकार दे दिया गया था. अधिकारी बिना वारंट के किसी को भी हिरासत में ले सकते थे और साथ ही कई मामलों में गिरफ्तारी की वजह तुरंत बताएं बिना भी ऐसा कर सकते थे. इस कानून में प्रीवेंटिव डिटेंशन की भी व्यवस्था थी. प्रीवेंटिव डिटेंशन का मतलब था कि अगर अधिकारियों को लगता है कि कोई व्यक्ति खतरा पैदा कर सकता है तो अपराध करने से पहले ही उसे जेल में डाला जा सकता था.
इमरजेंसी और गलत इस्तेमाल का आरोप
जून 1975 में इमरजेंसी की घोषणा की गई. इसके बाद मीसा असहमति को दबाने के लिए सरकार के मुख्य हथियारों में से एक बन गया. पूरे देश में विपक्षी नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, छात्र नेता और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया गया. आलोचकों का यह तर्क था कि इस कानून का इस्तेमाल सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के बजाय राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए किया जा रहा था. रिपोर्ट्स के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान मीसा के तहत एक लाख से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया था.
कानूनी उपायों पर बैन
इमरजेंसी के दौरान किए गए संशोधनों ने मीसा के तहत सरकार के अधिकार को और भी मजबूत किया. गिरफ्तार किए गए लोगों के लिए अदालत में अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देना काफी ज्यादा मुश्किल हो गया. जमानत और न्यायिक समीक्षा तक पहुंच को काफी ज्यादा सीमित कर दिया गया था. इस वजह से कई कैदियों के पास कानूनी विकल्प काफी कम रह गए थे.
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लालू प्रसाद यादव की गिरफ्तारी
आपातकाल के दौरान लालू प्रसाद यादव वरिष्ठ समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन यानी जेपी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे. एक युवा राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर लालू प्रसाद यादव ने सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. बाद में उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और वे इमरजेंसी के दौरान लंबे समय तक जेल में रहे. कहा जाता है कि उन्हें लगभग 21 महीने जेल में रखा गया था.
मीसा भारती नाम के पीछे की कहानी
जब लालू प्रसाद यादव जेल में थे तब उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने 22 मई 1976 को अपनी पहली बेटी को जन्म दिया. लालू प्रसाद यादव और जेपी आंदोलन से जुड़ी जानकारी के मुताबिक जयप्रकाश नारायण ने बच्ची का नाम मीसा रखने का सुझाव दिया. ऐसा इसलिए ताकि आने वाली पीढ़ी इमरजेंसी और उस विवादित कानून के खिलाफ हुए संघर्ष को याद रख पाए. इस सुझाव को मानते हुए लालू प्रसाद यादव ने अपनी बेटी का नाम मीसा भारती रख दिया.
कैसे हुआ कानून रद्द?
इमरजेंसी खत्म होने और 1977 में जनता पार्टी के सरकार सत्ता में आने के बाद नई सरकार ने मीसा की कड़ी आलोचना की. आखिरकार इस कानून को रद्द कर दिया गया.
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