25 साल की देरी पर भी अग्रिम जमानत दी: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुकदमे के खिलाफ किया वाक्यांश "तारीख पर तारीख"
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2001 के अपहरण मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत दी है। अदालत ने कहा है कि 25 साल तक लंबित रहना अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का मजाक नहीं है। अदालत ने दोनों आरोपियों को ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने और अग्रिम जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है।

सौजन्य से:- India Today
न्याय 'तारीख पर तारीख' नहीं हो सकता: मुकदमे में 25 साल की देरी पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2001 के अपहरण मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी। इसमें कहा गया है कि 25 साल तक लंबित रहना अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का मजाक उड़ाता है।
लगभग 25 वर्षों से लंबित अपहरण के एक मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि आपराधिक न्याय प्रणाली को 'तारीख पर तारीख' वाक्यांश तक सीमित नहीं किया जा सकता है। इस मामले में एक महिला शामिल है, अदालत को बताया गया कि वह स्वेच्छा से एक आरोपी के साथ गई थी, बाद में उससे शादी कर ली और अब उसकी पत्नी के रूप में उसके साथ रह रही है। दंपति के तीन बच्चे हैं।
हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक आपराधिक मामले को दो दशक से अधिक समय तक लंबित रखना अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई की संवैधानिक गारंटी के विपरीत है। अदालत ने मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत भी दे दी।
न्यायमूर्ति राजीव भारती ने 2001 में बहराइच के पयागपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले के संबंध में अजय कुमार उर्फ चिंगी और राम चंद्र की अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी देते हुए ये टिप्पणियां कीं। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि कथित पीड़िता अपनी मर्जी से अजय कुमार के साथ गई थी और बाद में दोनों ने शादी कर ली। राज्य इन तथ्यों पर प्रभावी ढंग से विवाद करने में असमर्थ था।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि वर्षों से मुकदमे में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है और आपराधिक कार्यवाही महज औपचारिकता बनकर रह गई है। इसमें कहा गया कि न्याय को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। 'तारीख पे तारीख' वाक्यांश का जिक्र करते हुए - सनी देओल-स्टारर दामिनी का एक प्रसिद्ध संवाद - अदालत ने कहा कि बार-बार स्थगन आपराधिक न्याय वितरण प्रणाली को परिभाषित नहीं कर सकता है।
अदालत ने दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया और कहा कि उन्हें निर्दिष्ट शर्तों के अधीन अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए। इसने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत आदेश में की गई टिप्पणियों से मामले की योग्यता के आधार पर निर्णय लेते समय ट्रायल कोर्ट पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
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