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दंगाईयों को 20 वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ठहराया दोषी, आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का केस

2020 दिल्ली दंगों के दौरान आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में अदालत ने पूर्व निगम पार्षद ताहिर हुसैन सहित पांच आरोपितों को 20 वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर दोषी ठहराया है।

14 जुलाई 2026 को 07:14 pm बजे
दंगाईयों को 20 वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ठहराया दोषी, आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का केस

सौजन्य से:- Jagran

IB अधिकारी मर्डर केस: 20 वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने दंगाईयों को ठहराया दोषी

2020 के दिल्ली दंगों में आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में अदालत ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच को दोषी ठहराया है। यह फैसला 20 वैज ...और पढ़ें

HighLights

- आईबी अधिकारी अंकित शर्मा हत्याकांड में पांच दोषी करार।

- 2020 दिल्ली दंगों से जुड़ा मामला, ताहिर हुसैन भी शामिल।

- 20 वैज्ञानिक और अकाट्य साक्ष्यों ने साबित किया गुनाह।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए भीषण दंगों के दौरान आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की बेरहमी से की गई हत्या के मामले में अदालत ने पूर्व निगम पार्षद मोहम्मद ताहिर हुसैन सहित पांच आरोपितों को 20 बड़े और महत्वपूर्ण साक्ष्यों के दम पर दोषी करार दिया है।

अदालत ने इस मामले में ताहिर हुसैन, नाज़िम, कासिम, जावेद और अनस को अंकित शर्मा की हत्या, दंगा भड़काने और हिंदुओं को निशाना बनाने की आपराधिक साजिश का दोषी पाया। जांच एजेंसी एसआइटी, क्राइम ब्रांच द्वारा तैयार की गई वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधा पर चार्जशीट के चलते बचाव पक्ष की हर दलील धरी की धरी रह गई।

1. वैज्ञानिक और अकाट्य साक्ष्यों पर आधारित जांच: यह पूरी तफ्तीश केवल आरोपितों या सुनी-सुनाई बातों पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, फारेंसिक, इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्यों पर टिकी थी। पुलिस ने कड़ी से कड़ी जोड़कर ऐसा जाल बुना कि दंगाई बच नहीं सके।

2. सीसीटीवी फुटेज का महा-विश्लेषण: पुलिस ने कई इलाकों के सीसीटीवी फुटेज जुटाए। जिससे पता चला कि दंगाईयों ने पकड़े जाने के डर से कई कैमरों के रुख मोड़ दिए थे या उन्हें ढक दिया था। हालांकि, एक चश्मदीद द्वारा मोबाइल से बनाया गया वीडियो हाथ लगा, जिसमें तीन लोग चांद बाग पुलिया के पास खजुरी नाले में अंकित शर्मा की लाश फेंकते दिख रहे थे। फारेंसिक जांच में यह फुटेज बिल्कुल सही पाया गया।

3. कई स्वतंत्र स्रोतों से पहचान: दंगाईयों की पहचान के लिए पुलिस ने किसी एक गवाह पर भरोसा नहीं किया। चश्मदीदों, इलेक्ट्रॉनिक डाटा और अन्य सहयोगी साक्ष्यों के जरिए दंगाईयों की वारदात में मौजूदगी साबित की गई।

4. डिजिटल और मोबाइल साक्ष्यों का चक्रव्यूह: दंगाईयों के मोबाइल फोन रिकार्ड, सीडीआर और वारदात के समय उनकी लोकेशन का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। इसके अलावा, जांच अधिकारी ने गवाहों को संदिग्धों की पहचान कराने के लिए तस्वीरों की मदद ली, जिसे अदालत ने सही माना।

5. भारी मात्रा में हथियारों और दंगों की सामग्री की बरामदगी: हत्या में इस्तेमाल हथियार (चाकू), नाले की दीवार और मिट्टी से खून के नमूने बरामद किए गए। इसके अलावा, मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन के घर की छत से भारी मात्रा में पत्थर, ईंटें, पेट्रोल बम (कांच की बोतलों में भरा पेट्रोल) और गुलेल बरामद हुए थे, जिसे कोर्ट ने पुख्ता सबूत माना।

6. पोस्टमार्टम और फारेंसिक रिपोर्ट: पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अंकित शर्मा के शरीर पर धारदार और भारी हथियारों से किए गए 51 गहरे और गंभीर घाव पाए गए थे। फारेंसिक विभाग ने बाद में अपनी राय में स्पष्ट किया कि बरामद किए गए चाकुओं और हथियारों से ही ये चोटें पहुंचाई जा सकती थीं।

7. हर एक परिस्थिति की पूरी कड़ी : दंगे की शुरुआत से लेकर अंकित शर्मा के वहां पहुंचने, उन पर हुए जानलेवा हमले, हत्या और फिर शव को नाले में ठिकाने लगाने तक की पूरी क्रोनोलाजी को पुलिस ने बिना किसी संदेह के अदालत में साबित किया।

8. 91 गवाहों की गवाही और उनकी सुरक्षा: अदालत में कुल 91 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए, जिनमें आम जनता, पुलिसकर्मी, मेडिकल एक्सपर्ट्स और फारेंसिक वैज्ञानिक शामिल थे। मुकदमे के दौरान पीड़ित परिवार और मुख्य गवाहों को पूरी सुरक्षा दी गई, जिससे वे बिना डरे गवाही दे सके।

9. पेशेवर और बारीक कागजी कार्रवाई: अपराध स्थल का नक्शा, जब्ती मेमो, गिरफ्तारी मेमो और आरोपियों के कबूलनामे जैसे सभी कानूनी दस्तावेजों को पुलिस ने बेहद पेशेवर तरीके से तैयार किया और अदालत में साबित किया।

10. बचाव पक्ष के आरोपों का करारा जवाब: बचाव पक्ष के वकीलों ने एफआइआर में देरी और गवाहों की विश्वसनीयता पर कई सवाल उठाए, लेकिन सरकारी वकील और जांच टीम ने हर एक आपत्ति का तकनीकी और कानूनी तौर पर मुंहतोड़ जवाब दिया।

11. बयानों और वैज्ञानिक सबूतों में सटीक तालमेल: गवाहों ने आंखों देखा जो हाल बताया, डाक्टरों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फारेंसिक लैब की रिपोर्ट ने भी हूबहू उसी बात की पुष्टि की। इस तालमेल ने केस को बेहद मजबूत बना दिया।

12. बेहद संवेदनशील माहौल में निष्पक्ष जांच: दंगों के बाद फैले सांप्रदायिक तनाव और भारी जन-आक्रोश के बावजूद, जांच अधिकारी ने पूरी निष्पक्षता और पेशेवर रवैये से सबूत जुटाए, जिससे यह मामला कोर्ट में टिक सका।

13. अदालत द्वारा खुद अपराध स्थल का निरीक्षण: मामला कितना संवेदनशील था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 11 मई 2026 को खुद ट्रायल कोर्ट ने अपराध स्थल (चांद बाग पुलिया और नाले) का दौरा किया। कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने जांच के दौरान नक्शे में जो-जो जगहें दिखाई थीं, वे हकीकत में बिल्कुल सही थीं।

14. व्यापक और विस्तृत चार्जशीट: जांच एजेंसी ने एक ऐसी व्यापक चार्जशीट दाखिल की, जिसमें मौखिक गवाही से लेकर वैज्ञानिक और मेडिकल सबूतों का पूरा लेखा-जोखा था। इसने अदालत के लिए आरोपियों का दोष तय करना आसान कर दिया।

15. विभिन्न एजेंसियों का बेहतरीन तालमेल: इस मामले को सुलझाने में स्थानीय पुलिस, क्राइम ब्रांच, फारेंसिक एक्सपर्ट्स, मेडिकल अथारिटी और अभियोजन टीम के बीच गजब का तालमेल देखने को मिला।

16. लंबे चले ट्रायल में अडिग रही पुलिस: यह मुकदमा लंबा चला, लेकिन जांच अधिकारी हर मोड़ पर मुस्तैद रहे। जब भी अदालत को किसी सबूत, दस्तावेज या गवाह की जरूरत पड़ी, पुलिस ने उसे तुरंत कोर्ट के सामने पेश किया।

17. नामी वकीलों की फौज के बावजूद सजा: दंगाईयों की पैरवी देश के बेहद अनुभवी और नामी वकीलों की टीम कर रही थी। उन्होंने कानूनी दांव-पेंच के जरिए केस को भटकाने की पूरी कोशिश की, लेकिन पुलिस की मजबूत जांच के आगे उनकी एक न चली।

18. कानून के शासन की जीत: 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान हुए इस जघन्य हत्याकांड को उसके तार्किक अंजाम तक पहुंचाकर, अदालत और पुलिस ने यह साबित कर दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

19. न्यायिक समीक्षा में खरी उतरी जांच: अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि मौखिक, दस्तावेजी, मेडिकल और फॉरेंसिक सबूतों के गहन मूल्यांकन के बाद अभियोजन पक्ष ने आरोपियों का गुनाह बिना किसी संदेह के साबित कर दिया है।

20. अंकित शर्मा के शव को जलाने की कोशिश का पर्दाफाश: फारेंसिक और मेडिकल जांच से यह भी साफ हुआ कि दंगाइयों ने न सिर्फ अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या की, बल्कि पहचान छिपाने के लिए उनके शव के कुछ हिस्सों को जलाने की कोशिश भी की थी।

अदालत ने पाया कि 25 फरवरी 2020 को शाम करीब 4.30 से 5 बजे के बीच चांद बाग पुलिया पर दंगाइयों की एक हिंसक भीड़ जमा थी, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदुओं को नुकसान पहुंचाना था।

यह भी पढ़ें- दिल्ली की सड़कों से जल्द गायब होंगे गड्ढे, सरकार कर रही 'स्प्रे इंजेक्शन पैचिंग' तकनीक का ट्रायल

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