हिंदू कानून: मनुस्मृति से जुड़ी गलतफहमी दूर, जानें क्या है मिताक्षरा व दायभाग विचारधारा
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हिंदू कानून को मनुस्मृति से जोड़ने को गलत बताया है, क्योंकि ज्यादातर हिंदू मिताक्षरा विचारधारा को मानते हैं। मेहता ने हिंदू कानून की दो विचारधाराओं - मिताक्षरा और दायभाग का उल्लेख किया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हिंदू कानून को मनुस्मृति से जोड़ने को गलत बताया है, क्योंकि ज्यादातर हिंदू मिताक्षरा विचारधारा को मानते हैं। यह 'याज्ञवल्क्य स्मृति' पर आधारित है। असम और बंगाल में 'दयाभाग' विचारधारा प्रचलित है। एसजी तुषार मेहता ने हिंदू कानून की दो विचारधाराओं का उल्लेख किया।
नई दिल्ली: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शनिवार को कहा कि हिंदू कानून को ‘मनुस्मृति’ से जोड़ना एक गलतफहमी है, क्योंकि असम और बंगाल को छोड़कर ज्यादातर हिंदू ‘मिताक्षरा’ विचारधारा को मानते हैं। ‘प्राचीन ज्ञान और कानूनी समझ’ पर एक लेक्चर देते हुए मेहता ने कहा कि जो लोग यह आरोप लगाते हैं कि हिंदू कानून ‘मनुस्मृति’ पर आधारित है, वे असल में गलत हैं, क्योंकि भारत का ज्यादातर हिस्सा ‘मिताक्षरा’ विचारधारा को मानता है, जो ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ पर आधारित है।
700 ईस्वी से पहले से हिंदू कानून की दो विचारधाराएं प्रचलित रही हैं
उन्होंने आगे कहा कि भारत में बहुत पुराने समय से, कम से कम 700 ईस्वी से पहले से, हिंदू कानून की दो विचारधाराएं प्रचलित रही हैं। हिंदू कानून में पहली विचारधारा ‘मिताक्षरा’ है और दूसरी विचारधारा ‘दायभाग’ है।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि विज्ञानेश्वर की विकसित की गई 'मिताक्षरा' विचारधारा पूरी तरह से 'याज्ञवल्क्य स्मृति' पर आधारित थी, न कि 'मनुस्मृति' पर। उन्होंने बताया कि यह बंगाल और असम को छोड़कर पूरे देश में प्रचलित थी; इन दोनों राज्यों में 'दायभाग' विचारधारा मानी जाती थी, जो 'मनुस्मृति' पर आधारित थी।
दयाभाग प्रणाली विरासत को पिंडदान करने की क्षमता से जोड़ती है
धर्मग्रंथों में बताए गए विरासत के अधिकारों के आधार पर इन दोनों विचारधाराओं में अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि 'दायभाग' विचारधारा में विरासत का अधिकार केवल उन्हीं लोगों को मिलता था जो 'पिंड दान' कर सकते थे। इस व्यवस्था के अनुसार, 'पिंड' का मतलब 'श्राद्ध' समारोह में पूर्वजों को चढ़ाया जाने वाला चावल का गोला (राइस केक) होता था। दो राज्यों में प्रचलित 'दायभाग' विचारधारा में इसका अर्थ बहुत सीमित था।
उन्होंने कहा कि 'मिताक्षरा' स्कूल उदार और ज्यादा गतिशील था क्योंकि यह 'पिंड' को DNA मानकर जन्म से ही विरासत का अधिकार देता था। यह अवधारणा आज भी मौजूद है, क्योंकि हिंदू परिवार में 'कोपार्सनर' (सह-उत्तराधिकारी) को जन्म से ही विरासत का अधिकार मिलता है।
गोद लेने के मामले में भी मेहता ने दिया जवाब
गोद लेने के मामले में, मेहता ने "गोद लेने के अधिकार" की चार प्रचलित व्याख्याएं पेश कीं। उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू धर्मग्रंथों पर आधारित कानूनों की व्याख्या गतिशील तरीके से की जा सकती है। उन्होंने स्त्री और पुरुष के बीच 'रिश्तों की वर्जित श्रेणियों' को तय करने वाली प्राचीन समझ की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि 700 ईस्वी से बहुत पहले बनाई गई इस व्यवस्था को संसद ने हिंदू विवाह कानून को संहिताबद्ध करते समय मंज़ूरी दी थी।
लेखक के बारे मेंसंजीव कुमारसंजीव कुमार (सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर)
संजीव कुमार वर्तमान में नवभारत टाइम्स में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। वे मई 2025 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के नवभारत टाइम्स, डिजिटल विंग से जुड़े। पत्रकारिता में ऑनलाइन न्यूज डेस्क पर उन्हें काम करने का 6 साल का अनुभव है। नवभारत टाइम्स में जुड़ने से पहले वह अमर उजाला, वन इंडिया हिंदी और दैनिक जागरण के डिजिटल विंग में सेवा दे चुके हैं। वह वर्तमान में नवभारत टाइम्स में नेशनल और दिल्ली डेस्क से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं। खबरों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए स्रोतों की जांच के साथ तथ्यों की पुष्टि अनिवार्य रूप से करते हैं।
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मूल रूप से बिहार के बेगूसराय के रहने वाले संजीव कुमार ने वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी से बैचेलर इन मीडिया साइंस में स्नातक किया। फिर आईसीएफएआई यूनिवर्सिटी से मास्टर इन मीडिया बिजनेस मैनेजमेंट की भी डिग्री ली। इसके अलावा उन्होंने मीडिया से संबंधित कई ऑनलाइन कोर्स भी किए हैं।... और पढ़ें
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