सुप्रीम कोर्ट ने जंतर‑मंत्र प्रदर्शनकारियों को राहत, FIR रद्द करने की याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने जंतर‑मंत्र में प्रदर्शन करने वाले छात्रों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए FIR को रद्द करने के अपने पूर्व आदेश की समीक्षा करने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति ने कहा कि छात्रों को बार‑बार कोर्ट के चक्रव्यूह में नहीं फँसाया जाना चाहिए और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उनका निर्णय वैध है। इस कदम से छात्रों के भविष्य और उनके परिवारों की चिंताओं को ध्यान में रखा गया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
जंतर-मंतर प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों को दी बड़ी राहत, FIR पर कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका खारिज
यह याचिका कोर्ट द्वारा 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का आदेश पारित किए जाने से पहले दायर की गई थी.
By Sumit Saxena
Published : October 9, 2026 at 2:17 PM IST
नई दिल्ली: "जुलाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले छात्र प्रदर्शनकारी युवा थे, जिनका पूरा जीवन और भविष्य उनके सामने है. न्यायपालिका को उनके माता-पिता और उनके लंबे समय के भविष्य को ध्यान में रखना चाहिए." शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियां उस याचिका को सुनने से इनकार करते हुए कीं, जिसमें दिल्ली पुलिस द्वारा छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर की जांच कराने की मांग की गई थी.
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यह याचिका असल में उन मामलों को रद्द करने वाले उसके पिछले आदेश की समीक्षा करने जैसी थी. अदालत ने यह भी कहा कि वह छात्रों को बार-बार कोर्ट के चक्करों में नहीं फंसाना चाहती. यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने आया.
पीठ एल. रामनाथन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने तर्क दिया था कि पुलिस के कामकाज में कोई न्यायिक हस्तक्षेप नहीं हो सकता, क्योंकि पुलिस "स्वतंत्र और संप्रभु" है. यह याचिका कोर्ट द्वारा 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का आदेश पारित किए जाने से पहले दायर की गई थी. इस याचिका में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के संस्थापक अभिजीत दीपके को भी एक प्रतिवादी बनाया गया था.
पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता का पक्ष वकील मैथ्यूज जे. नेदुम्पारा रख रहे थे. सुनवाई के दौरान, नेदुम्पारा ने वास्तविक याचिकाकर्ताओं की अनुपस्थिति में इस जनहित याचिका के विचारणीय होने पर सवाल उठाए. इस पर पीठ ने कहा कि उसने छात्र प्रदर्शनकारियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एफआईआर को रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अदालत हमेशा शत-प्रतिशत सही आदेश ही पारित करेगी. बेंच ने याचिका में किए गए उस दावे का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि अदालत को जंतर-मंतर प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर को रद्द करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था.
याचिकाकर्ता का पक्ष रख रहे वकील मैथ्यूज नेदुम्पारा से सीजेआई ने कहा, "कृपया इस बात को समझिए कि हमारे सामने ये युवा छात्र और प्रदर्शनकारी हैं. हमें उनके माता-पिता और उनके लंबे भविष्य को देखना होगा. हम उन्हें बार-बार अदालत आने और सुनवाइयों में शामिल होने के चक्करों में नहीं फंसाना चाहते..."
मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा सितंबर में पारित किए गए एक आदेश का हवाला दिया. पिछले साल 9 सितंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार को कुछ मौजूदा और पूर्व विधायकों के खिलाफ दर्ज कई आपराधिक मामलों को वापस लेने की अनुमति दी थी. ये मामले कोविड-19 महामारी के दौरान दर्ज किए गए थे. इस मामले की सुनवाई भी सीजेआई की अगुवाई वाली इसी बेंच ने की थी.
पीठ ने नोट किया कि इन मामलों में पुतले फूंकने और हाईवे पर 'धरना' देने जैसे आरोप शामिल थे, और इनमें कोई गंभीर या जघन्य अपराध नहीं थे. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश राज्य सरकार द्वारा दायर उस याचिका पर पारित किया, जिसमें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के अप्रैल 2024 के एक आदेश को चुनौती दी गई थी.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक अदालती आदेश जारी किया था, इसलिए जनप्रतितिधियों (विधायकों) के खिलाफ मामलों को हटाया नहीं जा सकता था. इसी वजह से हाईकोर्ट ने इस मामले पर विचार करने से इनकार कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी. सीजेआई ने टिप्पणी की, "वे कोई पेशेवर अपराधी नहीं हैं. एक समय पर जनहित में..."
बेंच वकील मैथ्यूज नेदुम्पारा के मुवक्किल की याचिका पर सुनवाई करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी. अदालत ने माना कि इस याचिका में जो मांग की गई है, वह असल में एफआईआर रद्द करने के उसके पिछले फैसले को चुनौती देने जैसी ही है. पीठ ने कहा, "यह याचिका हमारे उस आदेश (अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर एफआईआर रद्द करने का आदेश) की समीक्षा (रिव्यू) मांगने जैसी है."
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