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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, NEET प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने का रास्ता साफ

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें NEET प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को वापस ले सकती हैं, बशर्ते छात्र का कोई गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड न हो। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि से आशय केवल गंभीर और जघन्य अपराधों से है, न कि छोटे-मोटे मामलों से।

4 अगस्त 2026 को 12:15 am बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, NEET प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने का रास्ता साफ

सौजन्य से:- Navbharat Times

'अपराधिक रिकॉर्ड का मतलब केवल गंभीर अपराध', सुप्रीम कोर्ट ने दूर किया FIR वापसी से जुड़ा भ्रम

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि NEET प्रदर्शन में शामिल छात्रों पर दर्ज FIR को राज्य सरकारें वापस ले सकती हैं, बशर्ते छात्र का कोई गंभीर या जघन्य आपराधिक रिकॉर्ड (जैसे हत्या, बलात्कार) न हो।

अदालत ने किया स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नीट पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र आंदोलनों से जुड़े मामलों में अपने 28 जुलाई के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि राज्य सरकारें कानून के अनुसार प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को वापस लेने या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर उन्हें बंद करने के लिए स्वतंत्र हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके पिछले आदेश में इस्तेमाल किए गए "क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स" (आपराधिक पृष्ठभूमि) का अर्थ केवल गंभीर और जघन्य अपराधों से है, न कि छोटे-मोटे मामलों से।28 जुलाई का क्या था आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई के अपने अहम आदेश में कहा था कि बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले सभी स्टूडेंट्स को रिहा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में कहा कि जिन छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जिन्हें केवल प्रदर्शन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है, उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। शुरुआत में कोर्ट ने 18 वर्ष से कम उम्र के छात्रों की रिहाई का निर्देश दिया था, लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने बताया कि कई हिरासत में लिए गए छात्र 19-20 वर्ष की आयु के हैं। ऐसे छात्रों के खिलाफ नहीं होगी कार्रवाई

इसके बाद कोर्ट ने आदेश स्पष्ट करते हुए कहा था कि आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं रखने वाले सभी छात्र, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो, रिहा किए जाएं। पीठ ने यह भी कहा था कि ऐसे छात्रों के खिलाफ फिलहाल कोई दमनात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि, जिनके खिलाफ आपराधिक रिकॉर्ड है, उन्हें इस राहत का लाभ नहीं मिलेगा। दिल्ली पुलिस को दर्ज एफआईआर की जांच जारी रखने की अनुमति दी गई थी, लेकिन पात्र छात्रों के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाने को कहा गया था।एफआईआर वापस लेने पर दूर किया भ्रम

सोमवार को सुनवाई की शुरुआत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों में राहत देने की अपनी प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर है, लेकिन इसे कानूनी रूप से लागू करने को लेकर कुछ व्यावहारिक दिक्कतें हैं। उन्होंने कहा कि कानून के तहत सीधे एफआईआर "वापस लेने" का प्रावधान नहीं है। इसके बजाय पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है, अभियोजन वापस लेने की अनुमति मांग सकती है या संबंधित अदालत एफआईआर रद्द कर सकती है। वकील ने कोर्ट से किया आग्रह

इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यों को कानून के अनुसार उचित प्रक्रिया अपनाकर एफआईआर बंद करने या वापस लेने की पूरी स्वतंत्रता है। सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से आग्रह किया कि "क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स" शब्द की व्याख्या स्पष्ट की जाए, ताकि ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन जैसे छोटे मामलों में छात्रों को राहत से वंचित न होना पड़े। इन लोगों पर दर्ज FIR नहीं होगी वापस

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके 28 जुलाई के आदेश में "क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स" से आशय केवल हत्या, बलात्कार या अन्य गंभीर एवं जघन्य अपराधों से है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मामूली मामलों में नाम आने वाले छात्रों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई जारी रहे। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि 2,700 से अधिक ऐसे लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस नहीं ली जाएंगी, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि गंभीर और जघन्य अपराधों से जुड़ी है।पुलिस की ज्यादती पर भी सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत का ध्यान उन वीडियो की ओर दिलाया, जिनमें पुलिसकर्मियों द्वारा कथित लाठीचार्ज और पेलेट गन के इस्तेमाल की घटनाएं दिखाई गई हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस आयुक्त और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के महानिदेशक से जवाब मांगा जाना चाहिए कि ऐसी कार्रवाई की अनुमति कैसे दी गई। इस पर चीफ जस्टिस ने स्पष्ट कहा कि अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों को किसी भी हालत में संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि छात्र आंदोलन की आड़ में यदि कोई आदतन या गंभीर अपराधी शामिल हुआ है तो उसे भी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।चेहरे की पहचान तकनीक पर भी उठे सवाल

वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने सुनवाई के दौरान बायोमेट्रिक निगरानी और फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों की पहचान चेहरे की पहचान तकनीक से की गई और नागरिकों ने इसके लिए अपनी सहमति नहीं दी थी। अदालत से इस मुद्दे की भी जांच कराने की मांग की गई। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों से मिलने निजामुद्दीन थाने पहुंचे एक अधिवक्ता के साथ पुलिस ने मारपीट की थी। उन्होंने इसे न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला बताया।एसआईटी की निगरानी और अगली सुनवाई

वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने सुझाव दिया कि मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) की निगरानी किसी पूर्व चीफ जस्टिस से कराई जाए। अदालत ने इस सुझाव पर तत्काल कोई आदेश नहीं दिया। पीठ ने सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को निर्धारित की।अब सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण के बाद

सोमवार के स्पष्टीकरण के बाद अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि ऐसे छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को कानून के अनुसार बंद करने या वापस लेने में राज्यों पर कोई रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज केस राज्य सरकार वापस लेने या क्लोज करने के लिए स्वतंत्र है। यानी सिर्फ उन्हीं मामले में राहत नहीं है जिन मामले में जघन्य और गंभीर मामले दर्ज हैं।कन्वर्सेशन शुरू करें

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