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सरकार ने पेश किया वंदे मातरम के लिए 3 साल की जेल का बिल, क्या है पूरा मामला?

केंद्र सरकार ने संसद के मानसून सत्र में राष्ट्रीय सम्मान अपमान रोकथाम (संशोधन) विधेयक पेश करने वाली है, जिसमें वंदे मातरम को भी शामिल किया जाएगा. सरकार का कहना है कि वंदे मातरम को भी वही कानूनी सम्मान मिलना चाहिए जो राष्ट्रीय गान को मिला हुआ है, जिसके तहत बाधा डालने पर 3 साल की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

21 जुलाई 2026 को 10:15 am बजे
सरकार ने पेश किया वंदे मातरम के लिए 3 साल की जेल का बिल, क्या है पूरा मामला?

सौजन्य से:- ndtv.in

- केंद्र सरकार संसद के मानसून सत्र में राष्ट्रीय सम्मान अपमान रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करने वाली है.

- इसके तहत अगर कोई इसे गाने से रोकता या बाधा पैदा करता है, तो उसे 3 साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं

- देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वंदे मातरम को जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाए.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह राज्यसभा में राष्ट्रीय सम्मान अपमान रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश करने वाले हैं. यह विधेयक 1971 के राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में संशोधन करेगा. सरकार का कहना है कि वंदे मातरम ने आजादी की लड़ाई में करोड़ों भारतीयों को प्रेरित किया था, इसलिए इसे भी वही कानूनी सम्मान मिलना चाहिए जो राष्ट्रीय गान को मिला हुआ है. वहीं विपक्ष का एक वर्ग और कुछ संवैधानिक विशेषज्ञ इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या देशभक्ति को कानून के जरिए लागू किया जा सकता है.

अभी इस कानून की धारा 3 केवल राष्ट्रीय गान 'जन गण मन' पर लागू होती है. इसके तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गान गाने से रोकता है या गान के दौरान बाधा पैदा करता है तो उसे अधिकतम तीन साल की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. अब सरकार इसी धारा में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को भी शामिल करना चाहती है. यानी कानून बनने के बाद दोनों के लिए एक जैसी सजा का प्रावधान होगा.

वंदे मातरम को लेकर अभी क्या नियम हैं?

फिलहाल वंदे मातरम को लेकर कोई अलग दंडात्मक कानून नहीं है. हाल ही में गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय गीत को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए थे. जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने के समय इसे गाया जा सकता है. सांस्कृतिक और सरकारी समारोहों में इसका उपयोग किया जा सकता है. राष्ट्रीय गीत गाए जाने के दौरान लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना चाहिए. स्कूल चाहें तो दिन की शुरुआत सामूहिक वंदे मातरम से कर सकते हैं. लेकिन इन दिशानिर्देशों में किसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं था.

फिर कानून लाने की जरूरत क्यों पड़ी?

सरकार का कहना है कि वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है. हजारों क्रांतिकारियों ने इसे आंदोलन का नारा बनाया. सरकार का तर्क है कि जब राष्ट्रीय गान को कानूनी सुरक्षा मिली हुई है, तब राष्ट्रीय गीत को भी समान सम्मान मिलना चाहिए. बिल के उद्देश्य और कारण में कहा गया है कि अभी राष्ट्रीय गीत के गायन में बाधा डालने पर कोई विशेष कानूनी प्रावधान नहीं है. इसलिए इसे कानून के दायरे में लाना जरूरी है.

क्या संविधान में राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान बराबर हैं?

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की बैठक में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वंदे मातरम को जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा. इसी आधार पर सरकार कह रही है कि दोनों का दर्जा बराबर माना गया था. हालांकि संविधान में राष्ट्रीय गीत शब्द का अलग से उल्लेख नहीं है. संविधान ने केवल राष्ट्रीय गान को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया. वंदे मातरम को सम्मानजनक राष्ट्रीय गीत का दर्जा संविधान सभा की घोषणा के जरिए मिला.

वंदे मातरम का इतिहास क्या है?

जन गण मन भारत का राष्ट्रीय गान है. वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. दोनों का संवैधानिक महत्व अलग-अलग है, लेकिन दोनों का ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा माना जाता है.

वंदे मातरम की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी. वंदे मातरम पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुई थी. बाद में, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपने अमर उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुई. रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतबद्ध किया था. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन गया था. सरकार पहले भी इस पर जोर दे चुकी है. पिछले साल संसद में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष चर्चा हुई थी. लोकसभा और राज्यसभा में कई घंटों तक इस पर बहस चली.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि उसने मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए गीत के कुछ हिस्से हटा दिए थे.

विपक्ष क्या कह रहा है?

वहीं कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा था कि कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में केवल शुरुआती दो अंतरों को सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए स्वीकार किया था क्योंकि बाद के हिस्सों पर कुछ समुदायों की आपत्तियां थीं.

उन्होंने कहा था कि "केवल पहले दो अंतरे ही ऐतिहासिक रूप से और सार्वजनिक रूप से गाए जाते रहे हैं, बाद के हिस्सों को लेकर पहले से मतभेद रहे हैं."

John Brittas, CPI(M) MP from Keralam has written a letter to Union Home Minister Amit Shah and Request for withdrawal of the Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 slated to be introduced in the Rajya Sabha during the forthcoming Session, which seeks to… pic.twitter.com/EpsaZDyaiq

— ANI (@ANI) July 19, 2026

वहीं सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास ने सरकार से इस बिल को वापस लेने की मांग की है.

केरल से सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख कर इस विधेयक को वापस लेने का आग्रह किया है। उन्होंने पत्र में लिखा, मैं यह पत्र लिखकर राज्यसभा में पेश किए जाने वाले प्रस्तावित राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पर गहरी चिंता व्यक्त कर रहा हूं. उनका कहना है कि देशभक्ति स्वेच्छा से होनी चाहिए, न कि कानूनी मजबूरी के कारण.

विवाद क्यों है?

वंदे मातरम को लेकर विवाद नया नहीं है. गीत के शुरुआती दो अंतरे सभी समुदायों में व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं. लेकिन बाद के हिस्सों में देवी दुर्गा सहित हिंदू धर्म के प्रतीकों का उल्लेख है. इसी वजह से आजादी से पहले भी कई नेताओं ने सुझाव दिया था कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएं. 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने भी इसी आधार पर इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था.

सुप्रीम कोर्ट पहले क्या कह चुका है?

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले बेहद अहम हैं. पहला मामला बीजॉय इमैनुएल (1986) का है इसमें सु्प्रीम कोर्ट ने ये फैसला दिया था कि राष्ट्र गान गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. सम्मान दिखाने के लिए खड़े होना पर्याप्त है. कोई व्यक्ति राष्ट्र गान के दौरान चुप रहता है तो इसे अपमान नहीं माना जा सकता. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश का संविधान देश के नागरिक की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करता है.

वहीं दूसरा मामला केरल हाई कोर्ट में आया 2014 में एक मामला था, जिसमें अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति राष्ट्र गान के दौरान जानबूझकर शोर मचाता है या कार्यक्रम में बाधा डालता है, तो यह अपराध हो सकता है और पुलिस जांच कर सकती है.

तो क्या अब वंदे मातरम गाना अनिवार्य हो जाएगा?

प्रस्तावित बिल किसी को वंदे मातरम गाने के लिए बाध्य नहीं करता. यह केवल उन मामलों पर लागू होगा जहां कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गीत गाने से रोकता है या गीत गाए जाने के दौरान व्यवधान पैदा करता है. हालांकि अगर कानून बनता है, तो भविष्य में अदालतों को यह तय करना होगा कि बाधा और सम्मान की कानूनी सीमा क्या होगी. साथ ही यह भी देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों, खासकर बीजॉय इमैनुएल के मामले में दिए गए निर्देशों के साथ इस कानून की व्याख्या कैसे की जाएगी.

ये भी पढ़ें: वंदे मातरम में बाधा डाली तो 3 साल की सजा, मॉनसून सेशन के पहले ही दिन अमित शाह पेश करेंगे बिल

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