समान कार्य, अलग वेतन? सुप्रीम कोर्ट ने अनुभव को आधार बना कर कहा, समान वेतन अनिवार्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल समान ड्यूटी और जिम्मेदारी से समान वेतन नहीं मिल सकता; वेतन समानता के लिए भर्ती स्रोत, योग्यता, अनुभव और अन्य प्रासंगिक कारकों में पर्याप्त समानता चाहिए। केस में सीधी भर्ती वाले शिक्षकों और प्रोमोशन/ट्रांसफर से आए शिक्षकों के अनुभव में अंतर को वैध मानते हुए वेतन अंतर को उचित ठहराया गया। यह निर्णय ‘Equal Pay for Equal Work’ सिद्धांत के यांत्रिक प्रयोग को सीमित करता है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
क्या समान काम के लिए समान वेतन की बात सही नहीं है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल समान ड्यूटी और समान जिम्मेदारियां निभाने से कर्मचारी समान वेतन के हकदार नहीं हो जाते।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में एक ऐसा मामला आया, जिसने अक्सर होने वाले बहस के मुद्दे Equal Pay for Equal Work को फिर से ताजा कर दिया। मामला केरल के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में सीनियर और जूनियर सेकेंडरी स्कूल के शिक्षकों से जुड़ा है। इस मामले में समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि ‘Equal Pay for Equal Work’ को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, केवल काम की कार्यात्मक समानता पर्याप्त नहीं है; वेतन समानता के लिए संबंधित कर्मचारियों के बीच सभी प्रासंगिक मानकों पर पर्याप्त समानता देखी जानी चाहिए।
क्या था मामला और क्या था सवाल?
मामला केरल के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों से जुड़ा था। दरअसल मामले में अपील करने वाले शिक्षक सीधी भर्ती के जरिए नियुक्त हुए थे और उन्होंने उन शिक्षकों के बराबर वेतनमान की मांग की थी, जो प्रोमोशन या ट्रांसफर के माध्यम से उसी कैडर में आए थे। मामले में दोनों श्रेणियों के शिक्षकों की योग्यता, ड्यूटी और जिम्मेदारियां समान होने का दावा किया गया था। लेकिन सवाल यह था कि समान कैडर और समान काम के बावजूद अलग वेतनमान रखा जा सकता है या नहीं, जिस पर शीर्ष अदालत को फैसला लेना था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में मामला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुना। तथ्यों पर गौर करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि Equal Pay for Equal Work कोई ऐसा सिद्धांत नहीं है जिसे हर मामले में सीधे लागू कर दिया जाए।
वेतन समानता का दावा तभी सफल हो सकता है जब संबंधित कर्मचारियों के बीच भर्ती के स्रोत, योग्यता, अनुभव, नियुक्ति की प्रक्रिया और जिम्मेदारियों सहित प्रासंगिक पहलुओं में पर्याप्त समानता हो।
कोर्ट ने कहा कि केवल यह दिखाना कि दोनों कर्मचारी समान कार्य करते हैं, अपने-आप समान वेतन का अधिकार पैदा नहीं करता। हालांकि, जहां सभी प्रासंगिक कारकों में पूर्ण समानता साबित हो, वहां अदालत उचित राहत दे सकती है।
समान वेतन का दावा संविधान के Article 14 में निहित समानता के सिद्धांत से जुड़ता है, जबकि Article 39(d) में समान काम के लिए समान वेतन का नीति-निर्देशक सिद्धांत मौजूद है।
संविधान और वेतन समानता का सिद्धांत
पुराने फैसलों और ‘Equal Pay’ सिद्धांत पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने Article 14 की चर्चा करते हुए कहा कि यह उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय के साथ Equal Pay for Equal Work के सिद्धांत के अनुप्रयोग को अधिक विस्तृत कसौटियों के साथ देखा गया है। State of Punjab v. Surjit Singh जैसे पुराने फैसलों में भी कोर्ट ने कहा था कि समान वेतन के लिए केवल कार्य की समानता नहीं बल्कि समान काम की समान वैल्यू और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को देखना होगा। इसलिए समान पदनाम या समान काम का होना अकेले वेतन समानता तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अनुभव को क्यों माना गया महत्वपूर्ण?
देखा जाए तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो नजरिया था, कि अनुभव को भी कमतर नहीं आंका जाना चाहिए। प्रोमोशन या ट्रांसफर से आए शिक्षकों के पास पहले से शिक्षक के रूप में सेवा का अनुभव था। जबकि सीधी भर्ती से नियुक्त शिक्षक उस पूर्व सेवा अनुभव के समान स्तर पर नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी अनुभव या अंतर को वैध और तार्किक अंतर माना, जिसका वेतन में अंतर से सीधा संबंध था। फिर इसी आधार पर प्रोमोशन या ट्रांसफर से आए शिक्षकों के लिए अधिक वेतनमान को सही मानते हुए बरकरार रखा गया।
तथ्यों और मामले में उल्लेखनीय बिंदुओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि ‘समान काम, समान वेतन’ का सिद्धांत केवल काम की बाहरी समानता पर आधारित नहीं है। वेतन समानता तय करते समय भर्ती का तरीका, योग्यता, पूर्व अनुभव, जिम्मेदारी और अन्य सेवा-संबंधी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। इसलिए G.P. Sangeetha v. State of Kerala में अदालत ने विशेष रूप से पूर्व सेवा अनुभव को वेतन में अंतर के लिए वैध आधार माना है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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