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सुप्रीम कोर्ट का डीएमके को कड़ा संदेश, करूर भगदड़ मामले में मुख्यमंत्री को रोकने की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने करूर भगदड़ मामले में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और अन्य नेताओं को पीड़ितों के परिवारों से मिलने से रोकने की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि वह राजनीतिक मंच नहीं बनाया जाना चाहिए और मुख्यमंत्री के दौरे को नियंत्रित नहीं कर सकता।

7 जुलाई 2026 को 01:57 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट का डीएमके को कड़ा संदेश, करूर भगदड़ मामले में मुख्यमंत्री को रोकने की याचिका खारिज

सौजन्य से:- AajTak

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को डीएमके की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और TVK के अन्य नेताओं को सितंबर 2025 में करूर में हुई भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवारों से मिलने या सार्वजनिक बयान देने से रोकने की मांग की गई थी.

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को 'राजनीतिक मंच' नहीं बनाया जाना चाहिए. बेंच ने याचिका के आधार पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि कोर्ट ने खुद इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे.

बेंच ने सवाल उठाते हुए कहा, "जिस सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मामले में सीबीआई जांच के निर्देश दिए हैं, वह किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की याचिका को कैसे स्वीकार कर सकता है? क्या आप चाहते हैं कि मुख्यमंत्री के दौरे को सुप्रीम कोर्ट कंट्रोल करे और उनके कार्यक्रम तय करे?"

याचिका में क्या मांग की गई और कोर्ट ने क्या कहा?

अपनी याचिका में, पूर्व सत्ताधारी डीएमके ने टीवीके मंत्री आधव अर्जुन की कथित टिप्पणियों पर कार्रवाई की मांग की. उनका कहना था कि इन बयानों से गवाह प्रभावित हो सकते हैं और करूर भगदड़ मामले की CBI जांच में बाधा आ सकती है. इस भगदड़ में पार्टी के एक कार्यक्रम के दौरान 41 लोगों की मौत हो गई थी.

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पार्टी ने कोर्ट से यह भी गुजारिश किया कि वह विजय को 10 जुलाई को करूर के प्रस्तावित दौरे के वक्त पीड़ितों के परिवारों से मिलने से रोके. इस दौरे पर उन्हें सरकारी लाभ बांटने यानी नौकरी और आर्थिक सहायता शामिल है.

सीबीआई जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय सुपरवाइजरी कमेटी कर रही है, जो कोर्ट के अक्टूबर 2025 के निर्देशों के मुताबिक काम कर रही है. लेकिन, बेंच ने इस दलील पर सवाल उठाया और कहा, "मान लीजिए, अगर कोई एग्जीक्यूटिव हेड पहले से वादा किया हुआ सामान बांटने जा रहा है, तो इससे पीड़ितों पर क्या असर पड़ेगा?"

यह भी पढ़ें: तमिलनाडु: CM विजय पर पर्सनल कमेंट पड़ा भारी, DMK विधायक गिरफ्तार

जब DMK की तरफ से पेश सीनियर वकील हुजेफा अहमदी ने दलील देते हुए कहा कि चिंता सिर्फ एग्जीक्यूटिव की नहीं है, बल्कि 'वह भी आरोपी है', तो रेस्पोंडेंट के वकील ने साफ किया कि मुख्यमंत्री का नाम किसी भी एफआईआर में आरोपी के तौर पर नहीं है. कोर्ट ने आगे कहा, "प्लीज चेक करें, मंत्री आरोपी हैं, मुख्यमंत्री नहीं."

याचिका को पूरी तरह से नामंजूर करते हुए, बेंच ने याचिकाकर्ता को एप्लीकेशन को आगे बढ़ाने के खिलाफ चेतावनी भी दी. कोर्ट ने कहा, "हम आपको सलाह देंगे कि आप इस एप्लीकेशन पर यहां जोर न दें. हम इसे खारिज कर देंगे."

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कोर्ट के बयानों के बाद, DMK ने दूसरे कानूनी रास्ते अपनाने के लिए अपनी अर्जियां वापस लेने की इजाजत मांगी. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें वापस ली गई मानकर खारिज कर दिया.

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