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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका, जांच व मुकदमे की मांग

एक जनहित याचिका वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी के माध्यम से चांद कुरैशी द्वारा दायर की गई है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध मतदाता सूची में हेरफेर और एकतरफा निर्णय जैसे आरोपों के लिए पुलिस जांच, सबूत जुटाने और आपराधिक मुकदमा चलाने की माँग की गई है। याचिकाकार तर्क देते हैं कि इन कार्यों को आधिकारिक कर्तव्य नहीं माना जा सकता और 2023 के चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16 द्वारा दी गई कानूनी सुरक्षा इन मामलों में लागू नहीं होती।

27 सितंबर 2026 को 01:04 am बजे
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका, जांच व मुकदमे की मांग

सौजन्य से:- Webdunia

CEC ज्ञानेश कुमार की बढ़ सकती हैं मुश्किलें? सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, क्या है याची की मांग?

Gyanesh Kumar Supreme Court Petition: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर उनके विरुद्ध एक 'आम आरोपी' की तरह पुलिस जांच, सबूत जुटाने और नियमित आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की गई है। सर्वोच्च अदालत के वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से दाखिल इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूची में अनधिकृत बदलाव और एकतरफा फैसले लेने जैसे कृत्य लोक सेवक के आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे में नहीं आते, इसलिए उन्हें किसी भी कानूनी ढाल का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

गंभीर आरोप और संज्ञेय अपराध

याचिका में 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि मतदाता सूची में हेरफेर और एकतरफा निर्णय लेने के मामले लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत गंभीर एवं संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं। ALSO READ: CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और गिरफ्तारी पर अड़ी कांग्रेस, देशभर में भारी प्रदर्शन, गुवाहाटी में नेता गिरफ्तार

याचिकाकर्ता का तर्क है कि दुर्भावनापूर्ण या आपराधिक आचरण को किसी भी स्थिति में किसी लोक सेवक का आधिकारिक कर्तव्य नहीं माना जा सकता। इसलिए, ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023’ की धारा 16 के तहत चुनाव आयुक्तों को मिलने वाला कानूनी संरक्षण इस मामले में निष्प्रभावी हो जाता है। ALSO READ: 10 महीने में 14 आपत्तियां और 13 करोड़ नाम हटने पर 2 चुनाव आयुक्तों ने ECI ज्ञानेश कुमार के फैसलों को 'अवैध' क्यों बताया?

याचिका में उठाए गए मुख्य मुद्दे

- फॉर्म 6 में बिना संशोधन बदलाव : नए युवा मतदाताओं के नामांकन के लिए बिना किसी विधायी संशोधन के अनिवार्य पैतृक शर्त (अंतिम एसआईआर लिंकेज) लागू करने का आरोप।

- सॉफ्टवेयर की विफलताएं : तकनीकी खामियों और सॉफ्टवेयर संबंधी गड़बड़ियों के कारण आम नागरिकों को उनके संवैधानिक मताधिकार से वंचित करना।

- पश्चिम बंगाल का विवादित मामला : अन्य चुनाव आयुक्तों या राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की मंजूरी के बिना, न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए 16.10 लाख से अधिक नागरिकों के नाम हटाने के लिए अनधिकृत अपीलें दायर करना।

कानूनी छूट और संवैधानिक स्थिति

याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत केवल देश के राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों को ही आपराधिक अभियोजन (Criminal Prosecution) से पूर्ण व्यक्तिगत छूट प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 324 मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उनके कार्यकाल की सुरक्षा (Tenure Protection) देता है, न कि किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व से बचाव। ALSO READ: एक खून माफ होता तो... VIP प्रमुख मुकेश सहनी का CEC ज्ञानेश कुमार पर बेहद विवादित बयान

कानूनी सिद्धांत 'धोखाधड़ी सब कुछ खारिज कर देती है' का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन करने पर कोई भी अधिकारी कानूनी सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।

2023 के नए कानून की धारा 16 का विवाद

'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत चुनाव आयुक्तों को उनके कार्यकाल के दौरान आधिकारिक कर्तव्यों के तहत किए गए कार्यों के लिए किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्रवाई से सुरक्षा दी गई है। याचिकाकर्ता इसी धारा की वैधता और उसकी सीमा को चुनौती दे रहे हैं कि आपराधिक कृत्यों को 'आधिकारिक कर्तव्य' नहीं माना जा सकता।

केरल कैडर के 1988 बैच के पूर्व आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने मार्च 2024 में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार ग्रहण किया था। गृह मंत्रालय में अपने कार्यकाल के दौरान वे धारा 370 के निरस्तीकरण और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। यह याचिका सीधे तौर पर भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) की संस्थागत स्वतंत्रता और पारदर्शिता से जुड़ी है, क्योंकि देश के मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधे तौर पर आपराधिक जांच की मांग का यह एक दुर्लभ मामला है।

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