बुलंदशहर में 47 साल बाद चौकीदार को मिली रिहाई, 140 बोरी गेहूँ के बड़े गबन केस में निर्दोष ठहराया
बुलंदशहर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय की पीठ ने 1979 के 140 बोरी सरकारी गेहूँ के गबन मामले में चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा को सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायाधीश कोमल शुक्ला ने साक्ष्य व गवाहियों के आधार पर उनका निर्दोष होने का फैसला सुनाया, जबकि मुख्य आरोपी राजवीर का मुकदमे के दौरान ही निधन हो गया।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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Bulandshahar News: 47 साल बाद अदालत बोली, चौकीदार निर्दाेष है...
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बुलंदशहर। न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार का एक और बड़ा उदाहरण सामने आया है। 47 साल पुराने 140 बोरी सरकारी गेहूं गबन के बहुचर्चित मुकदमे में न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए आरोपी चौकीदार को दोषमुक्त कर दिया है।
बुलंदशहर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय कक्ष संख्या-द्वितीय की पीठासीन अधिकारी कोमल शुक्ला ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा को सभी आरोपों से बरी कर दिया। मामले के मुख्य आरोपी केंद्र प्रभारी राजवीर की मुकदमे के दौरान ही मौत हो चुकी है।
एलएडीसीएस सहायक पुष्पेंद्र कुमार ने बताया कि मामला वर्ष 1979 का है। 13 जुलाई 1979 को पहासू गेहूं खरीद केंद्र से ट्रक संख्या यूएसएल 6735 के जरिये 140 बोरी गेहूं चन्द्रा ट्रांसपोर्ट कंपनी के माध्यम से भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदाम के लिए भेजा गया था। ट्रक के साथ केंद्र के चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा निवासी गांव साबितगढ़, पहासू को भेजा गया था।
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आरोप था कि यह गेहूं कभी एफसीआई के गोदाम में पहुंचा ही नहीं और रास्ते में ही उस दौरान की कीमत करीब 19,000 रुपये के गेहूं का गबन कर फर्जी दस्तावेज तैयार कर लिए गए। इस मामले में केंद्र प्रभारी राजवीर और चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा के खिलाफ पहासू थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने मामले की जांच पूरी कर विवेचना के बाद न्यायालय में दोनों नामजद आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया था।
लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान वर्ष 1999 में आरोपियों पर आरोप तय किए गए। इसी बीच, मुख्य आरोपी राजवीर की मृत्यु हो गई। इसके बाद 25 मई 2026 को उनके विरुद्ध कार्रवाई उपशमित यानि समाप्त कर दी गई। मुकदमे के दौरान केवल चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा ही ट्रायल का सामना कर रहे थे। अभियोजन की ओर से प्रस्तुत गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास सामने आया।
परिवहन विभाग से जुड़े रिकॉर्ड के अनुसार जिस वाहन संख्या का उल्लेख किया गया था, वह एक एंबेसडर कार के नाम दर्ज पाई गई, जिसमें 140 बोरी गेहूं लदना संभव ही नहीं था। इसके अलावा गवाह यह भी स्पष्ट नहीं कर सके कि फर्जी बताए गए चालान पर हस्ताक्षर वास्तव में आरोपी के ही थे या नहीं। न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा। इसके चलते अदालत ने चौकीदार को बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया है।
ट्रक का नंबर निकला एंबेसडर कार, अदालत में टिक नहीं सका अभियोजन
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन का सबसे बड़ा दावा परिवहन विभाग के साक्ष्य के सामने धराशायी हो गया। अभियोजन का आरोप था कि 140 बोरी गेहूं ट्रक संख्या यूएसएल 6735 से भेजा गया था। संभागीय परिवहन कार्यालय की गवाह सरोजबाला ने अदालत को बताया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार उक्त नंबर किसी ट्रक का नहीं, बल्कि एक एंबेसडर कार का है।
अदालत ने अपने फैसले में विशेष रूप से कहा कि एक एंबेसडर कार में 140 बोरी गेहूं लादकर ले जाना कतई मुमकिन नहीं है। इस तकनीकी और तथ्यात्मक खामी ने पूरे अभियोजन कथानक की पोल खोल कर रख दी है।
जिंदगी का आधा हिस्सा बीता पेशी में, अब ढलती उम्र में मिला सुकून
वर्ष 1979 में जब पहासू थाने में मुकदमा दर्ज हुआ था, तब नरेशचन्द्र महज 190 रुपये मासिक मानदेय पर गेहूं खरीद केंद्र पर अस्थायी चौकीदार के पद पर तैनात थे। एक छोटा सा कर्मचारी होते हुए भी उन पर गबन और कूटरचित दस्तावेज बनाने जैसी गंभीर धाराओं का बोझ लाद दिया गया।
करीब 47 साल तक नरेशचन्द्र तारीख-दर-तारीख अदालत के चक्कर काटते रहे। युवावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक जीवन का बड़ा हिस्सा गबन के कलंक और कानूनी जंग में बीत गया। अब अदालत द्वारा निर्दोष करार दिए जाने के बाद उन्होंने और उनके परिवार ने राहत की सांस ली है।
जब टूटने लगी उम्मीद, तब लीगल एड बनी सहारा
महज 190 रुपये महीने के मानदेय पर काम करने वाले अस्थायी चौकीदार नरेशचन्द्र के लिए 47 साल तक अदालत की चौखट नापना किसी सजा से कम नहीं था। उम्र ढलने के साथ शरीर शिथिल पड़ता गया और मुकदमों के भारी खर्च व वकीलों की फीस ने आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया। गरीबी और तंगी के दौर में जब इंसाफ की उम्मीदें दम तोड़ने लगी थीं, तब उन्होंने विधिक सेवा प्राधिकरण के लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम का दरवाजा खटखटाया।
सिस्टम के सहायक लीगल एड डिफेंस काउंसिल पुष्पेंद्र कुमार सिंह ने बुजुर्ग की बेगुनाही की लड़ाई को अपना दायित्व बनाया। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अदालत में कानूनी नब्ज टटोली, अभियोजन के विरोधाभासों को उजागर किया और 47 साल से गबन का दंश झेल रहे बुजुर्ग को न्याय दिलाया।
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बुलंदशहर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय कक्ष संख्या-द्वितीय की पीठासीन अधिकारी कोमल शुक्ला ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा को सभी आरोपों से बरी कर दिया। मामले के मुख्य आरोपी केंद्र प्रभारी राजवीर की मुकदमे के दौरान ही मौत हो चुकी है।
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एलएडीसीएस सहायक पुष्पेंद्र कुमार ने बताया कि मामला वर्ष 1979 का है। 13 जुलाई 1979 को पहासू गेहूं खरीद केंद्र से ट्रक संख्या यूएसएल 6735 के जरिये 140 बोरी गेहूं चन्द्रा ट्रांसपोर्ट कंपनी के माध्यम से भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदाम के लिए भेजा गया था। ट्रक के साथ केंद्र के चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा निवासी गांव साबितगढ़, पहासू को भेजा गया था।
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आरोप था कि यह गेहूं कभी एफसीआई के गोदाम में पहुंचा ही नहीं और रास्ते में ही उस दौरान की कीमत करीब 19,000 रुपये के गेहूं का गबन कर फर्जी दस्तावेज तैयार कर लिए गए। इस मामले में केंद्र प्रभारी राजवीर और चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा के खिलाफ पहासू थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने मामले की जांच पूरी कर विवेचना के बाद न्यायालय में दोनों नामजद आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया था।
लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान वर्ष 1999 में आरोपियों पर आरोप तय किए गए। इसी बीच, मुख्य आरोपी राजवीर की मृत्यु हो गई। इसके बाद 25 मई 2026 को उनके विरुद्ध कार्रवाई उपशमित यानि समाप्त कर दी गई। मुकदमे के दौरान केवल चौकीदार नरेशचन्द्र शर्मा ही ट्रायल का सामना कर रहे थे। अभियोजन की ओर से प्रस्तुत गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास सामने आया।
परिवहन विभाग से जुड़े रिकॉर्ड के अनुसार जिस वाहन संख्या का उल्लेख किया गया था, वह एक एंबेसडर कार के नाम दर्ज पाई गई, जिसमें 140 बोरी गेहूं लदना संभव ही नहीं था। इसके अलावा गवाह यह भी स्पष्ट नहीं कर सके कि फर्जी बताए गए चालान पर हस्ताक्षर वास्तव में आरोपी के ही थे या नहीं। न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा। इसके चलते अदालत ने चौकीदार को बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया है।
ट्रक का नंबर निकला एंबेसडर कार, अदालत में टिक नहीं सका अभियोजन
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन का सबसे बड़ा दावा परिवहन विभाग के साक्ष्य के सामने धराशायी हो गया। अभियोजन का आरोप था कि 140 बोरी गेहूं ट्रक संख्या यूएसएल 6735 से भेजा गया था। संभागीय परिवहन कार्यालय की गवाह सरोजबाला ने अदालत को बताया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार उक्त नंबर किसी ट्रक का नहीं, बल्कि एक एंबेसडर कार का है।
अदालत ने अपने फैसले में विशेष रूप से कहा कि एक एंबेसडर कार में 140 बोरी गेहूं लादकर ले जाना कतई मुमकिन नहीं है। इस तकनीकी और तथ्यात्मक खामी ने पूरे अभियोजन कथानक की पोल खोल कर रख दी है।
जिंदगी का आधा हिस्सा बीता पेशी में, अब ढलती उम्र में मिला सुकून
वर्ष 1979 में जब पहासू थाने में मुकदमा दर्ज हुआ था, तब नरेशचन्द्र महज 190 रुपये मासिक मानदेय पर गेहूं खरीद केंद्र पर अस्थायी चौकीदार के पद पर तैनात थे। एक छोटा सा कर्मचारी होते हुए भी उन पर गबन और कूटरचित दस्तावेज बनाने जैसी गंभीर धाराओं का बोझ लाद दिया गया।
करीब 47 साल तक नरेशचन्द्र तारीख-दर-तारीख अदालत के चक्कर काटते रहे। युवावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक जीवन का बड़ा हिस्सा गबन के कलंक और कानूनी जंग में बीत गया। अब अदालत द्वारा निर्दोष करार दिए जाने के बाद उन्होंने और उनके परिवार ने राहत की सांस ली है।
जब टूटने लगी उम्मीद, तब लीगल एड बनी सहारा
महज 190 रुपये महीने के मानदेय पर काम करने वाले अस्थायी चौकीदार नरेशचन्द्र के लिए 47 साल तक अदालत की चौखट नापना किसी सजा से कम नहीं था। उम्र ढलने के साथ शरीर शिथिल पड़ता गया और मुकदमों के भारी खर्च व वकीलों की फीस ने आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया। गरीबी और तंगी के दौर में जब इंसाफ की उम्मीदें दम तोड़ने लगी थीं, तब उन्होंने विधिक सेवा प्राधिकरण के लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम का दरवाजा खटखटाया।
सिस्टम के सहायक लीगल एड डिफेंस काउंसिल पुष्पेंद्र कुमार सिंह ने बुजुर्ग की बेगुनाही की लड़ाई को अपना दायित्व बनाया। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अदालत में कानूनी नब्ज टटोली, अभियोजन के विरोधाभासों को उजागर किया और 47 साल से गबन का दंश झेल रहे बुजुर्ग को न्याय दिलाया।
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