इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला: सरकारी दफ्तर लालफीताशाही का बहाना बनाकर देरी की माफी नहीं मांग सकते
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सरकारी विभाग लालफीताशाही का बहाना बनाकर मध्यस्थता मामलों में देरी की माफी नहीं मांग सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार और निजी पक्ष दोनों को लिमिटेशन कानून के तहत समान माना जाएगा और सरकारी विभागों को विशेष रियायत नहीं दी जा सकती।

सौजन्य से:- Jagran
सरकारी विभाग लालफीताशाही का बहाना बनाकर नहीं मांग सकते देरी की माफी: इलाहाबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सरकारी विभाग मध्यस्थता मामलों में देरी के लिए लालफीताशाही का बहाना नहीं बना सकते। ...और पढ़ें
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जागरण संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि सरकारी विभाग केवल लालफीताशाही, फाइलों के इधर-उधर घूमने या प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी का हवाला देकर मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामलों में विलंब से दायर अपीलों की देरी माफ कराने का अधिकार नहीं रखते।
अदालत ने स्पष्ट किया कि लिमिटेशन कानून के तहत सरकार और निजी पक्षकार दोनों समान हैं तथा सरकारी विभागों को किसी प्रकार की विशेष रियायत नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की पीठ ने रेल मंत्रालय की ओर से दाखिल विशेष अपील खारिज करते हुए की।
अदालत ने वाणिज्यिक न्यायालय, लखनऊ के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत आपत्तियां दाखिल करने में हुई 28 दिन की देरी माफ करने से इन्कार किया गया था।मामला मेसर्स गैलेंट इस्पात लिमिटेड और रेल मंत्रालय के बीच रेलवे साइडिंग के लिए लीज पर दी गई भूमि के किराये को लेकर उत्पन्न विवाद से जुड़ा था।
एकल मध्यस्थ ने दिसंबर 2023 में कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए रेलवे को लीज किराया संशोधित करने तथा अधिक वसूली गई करीब 1.79 करोड़ रुपये की राशि आठ प्रतिशत ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया था।
इसके बाद रेल मंत्रालय ने वाणिज्यिक न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन निर्धारित समय सीमा बीतने के बाद याचिका दाखिल होने के कारण उसकी देरी माफी अर्जी अस्वीकार कर दी गई, जिसके खिलाफ रेल मंत्रालय ने हाई कोर्ट का रुख किया था।
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अपील का विरोध करते हुए गैलेंट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा का तर्क था कि रेल मंत्रालय याचिका दाखिले में देरी को पर्याप्त तरीके से स्पष्ट नहीं कर पाया जिस कारण उक्त देरी क्षम्य नहीं हो सकती है।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि देरी माफी अपवाद है, नियम नहीं। सरकारी विभागों को भी यह साबित करना होगा कि देरी के पीछे वास्तविक, पर्याप्त और सद्भावनापूर्ण कारण थे। केवल प्रशासनिक सुस्ती या फाइलों की प्रक्रिया को पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर रेल मंत्रालय की अपील भी खारिज कर दी।
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