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हाई कोर्ट ने फैसला किया: अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट करना वैध नहीं है

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मिश्रा राइस मिल को अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट करने का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी फर्म को असंगत और अत्यधिक दंड माना जाता है, जब तक कि बेहद गंभीर कदाचार सिद्ध न हो।

7 जुलाई 2026 को 11:57 pm बजे
हाई कोर्ट ने फैसला किया: अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट करना वैध नहीं है

सौजन्य से:- Jagran

हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: फर्मों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकते

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भदोही स्थित मिश्रा राइस मिल को अनिश्चितकाल के लिए ब्लैकलिस्ट करने का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी फर्म या ठेकेद ...और पढ़ें

HighLights

- हाई कोर्ट ने मिश्रा राइस मिल की ब्लैकलिस्टिंग रद्द की।

- अनिश्चितकालीन ब्लैकलिस्टिंग को अनुचित दंड बताया कोर्ट ने।

- कारण बताओ नोटिस में निष्कर्ष तय करना गलत, कहा हाई कोर्ट।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भदोही स्थित मिश्रा राइस मिल को अनिश्चितकाल के लिए काली सूची में डाले जाने के आदेश को रद कर दिया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने मिल प्रोपराइटर अनिल मिश्रा की याचिका पर यह आदेश दिया है।

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कुलजा इंडस्ट्रीज बनाम बीएसएनएल मामले का हवाला देते हुए कहा है कि किसी भी ठेकेदार या फर्म को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट करना असंगत और अत्यधिक दंड माना जाता है, जब तक कि बेहद गंभीर कदाचार सिद्ध न हो जाए।

आरिक्स फिशरीज बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब कारण बताओ नोटिस में ही प्राधिकारी अपना निष्कर्ष पहले से तय कर लेता है तो बाद की पूरी प्रक्रिया खोखली औपचारिकता बनकर रह जाती है।

मुकदमे से जुड़े तथ्य यह है कि मीरजापुर के क्षेत्रीय खाद्य नियंत्रक (विंध्याचल मंडल) ने 25 अगस्त 2023 को आदेश जारी कर मिश्रा राइस मिल को धान क्रय और उसकी प्रक्रिया से अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया था।

यह कार्रवाई भदोही में दर्ज उस प्राथमिकी के आधार पर की गई थी, जिसमें आरोप था कि संतोष कुमार शुक्ला ने जिला खाद्य आपूर्ति अधिकारी की लागिन आइडी और पासवर्ड का दुरुपयोग कर कई किसानों की पहचान फर्जी तरीके से सत्यापित की थी। बाद में इस मामले में याची फर्म का नाम भी सामने आया।

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याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पूरा निर्णय केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर लिया गया, बिना किसी सामग्री या साक्ष्य के। कोर्ट ने कांति एसोसिएट्स बनाम मसूद अहमद खान मामले का हवाला देते हुए यह भी दोहराया कि किसी भी अर्द्ध-न्यायिक या प्रशासनिक आदेश में ठोस कारण देना अनिवार्य है, विशेषकर जब वह आदेश किसी पक्ष के लिए प्रतिकूल परिणाम वाला हो।

आदेश में केवल यह कहा गया था कि ‘आरोप की गंभीरता’ को देखते हुए याची का जवाब अस्वीकार्य है, इसे आदेश जारी करने के लिए पर्याप्त कारण मानने से कोर्ट ने इन्कार कर दिया।

हालांकि, कोर्ट ने खाद्य विभाग को स्वतंत्रता दी है कि वह चाहे तो कानून के अनुरूप नया कारण बताओ नोटिस देते हुए नया आदेश पारित कर सकता है।

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