अतिरिक्त शुल्क मामले में छात्रा को AIR INDIA से भारी मुआवजा, उपभोक्ता आयोग ने दिया आदेश
एक छात्रा को एयर इंडिया से अतिरिक्त शुल्क का भुगतान करना होगा। राजस्थान उपभोक्ता आयोग ने एयर इंडिया को आदेश दिया है कि उन्हें 74,131 रुपये का भुगतान करना होगा। छात्रा को स्कॉलर स्कीम के तहत लगेज शुल्क में छूट नहीं मिली थी।

सौजन्य से:- Navbharat Times
एयरलाइंस के यात्रियों से ज्यादा शुल्क लेने, तय सुविधाएं न देने के मामले सामने आते रहते हैं। पर कोई एयरलाइन गलती स्वीकार करने के बावजूद पैसा वापस न दे, तो मामला उपभोक्ता अधिकारों का बनता है।
नई दिल्ली: हवाई जहाज से यात्रा करने के दौरान आम आदमी के लिए जो सबसे बड़ा सिरदर्द होता है, वह है, जरुरत के मुताबिक और हवाई यात्रा के नियमों के अनुसार लगेज रखने की। इस दौरान एयरलाइंस द्वारा यात्रियों से अतिरिक्त शुल्क वसूलने या तय सुविधाएं न देने के मामले अक्सर सामने आते हैं। लेकिन जब कोई एयरलाइन अपनी ही घोषित योजना का लाभ देने से इनकार कर दे और बाद में गलती स्वीकार करने के बावजूद पैसा वापस न करे, तो मामला उपभोक्ता अधिकारों का बन जाता है।
ऐसे ही एक मामले में राजस्थान उपभोक्ता आयोग ने एयर इंडिया को एक छात्रा को कुल 74,131 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। मामले में एयरलाइन की लापरवाही के कारण छात्रा को सालों तक मानसिक प्रताड़ना और अनावश्यक मुकदमेबाजी झेलनी पड़ी।
क्या था ‘ महाराजा स्कॉलर स्कीम ’ और विवाद कैसे शुरू हुआ?
यह मामला जयपुर निवासी एक छात्रा से जुड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार छात्रा यूनाइटेड किंगडम में पढ़ाई कर रही थीं। जुलाई 2021 में लंदन से भारत आते वक्त, ज्यादा लगेज होने पर उसने एयर इंडिया से उसकी महाराजा स्कॉलर स्कीम के तहत लगेज शुल्क में छूट चाही। लेकिन एयरलाइन कर्मचारियों ने उन्हें इस योजना के लिए पात्र नहीं माना और 350 ब्रिटिश पाउंड यानी लगभग 34,131 रुपये अतिरिक्त बैगेज शुल्क के रूप में लिए।
बाद में एयर इंडिया ने मानी गलती पर रिफंड नहीं दिया
मामले में छात्रा के द्वारा कई ई-मेल और पत्राचार के बाद एयर इंडिया ने खुद यह माना कि छात्रा वास्तव में स्कॉलर स्कीम के लाभ की हकदार थीं। और सितंबर 2021 में एयरलाइन ने रिफंड प्रक्रिया शुरू करने की बात कही और भुगतान के लिए आवश्यक बैंक व कार्ड संबंधी जानकारी भी मांगी। लेकिन इसके बावजूद राशि वापस नहीं की गई। जब महीनों तक कोई समाधान नहीं निकला, तब जाकर छात्रा को उपभोक्ता आयोग से शिकायत करनी पड़ी।
उपभोक्ता आयोग का आकलन और फैसला
मामले में शुरुआती फैसला आया, जिला उपभोक्ता आयोग का। इसने फरवरी 2024 में छात्रा के पक्ष में फैसला देते हुए 34,131 रुपये वापस करने का आदेश दिया। साथ ही 4,000 रुपये मानसिक पीड़ा के लिए और 3,000 रुपये मुकदमे के रुप में हुए खर्चे की भरपाई करने को भी कहा।
जिला उपभोक्ता आयोग के फैसले को छात्रा ने नाकाफी माना और इस मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की।
राज्य आयोग ने रिकॉर्ड, और तमाम साक्ष्यों पर गौर करने के बाद यह पाया कि एयर इंडिया ने स्वयं छात्रा की पात्रता स्वीकार कर ली थी, फिर भी रिफंड नहीं किया गया। इसलिए
आयोग ने माना कि एयर इंडिया की ओर से यह Deficiency in Service यानी सेवा में कमी का स्पष्ट मामला है।
आयोग ने मानसिक पीड़ा का मुआवजा बढ़ाकर 30,000 रुपये और मुकदमेबाजी खर्च बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दिया। रिफंड की मूल राशि 34,131 रुपये जिला उपभोक्ता आयोग के अनुसार ही रखी गई। इस प्रकार छात्रा को कुल रिफंड 74,131 रुपये देने का आदेश हुआ।
उपभोक्ता कानून के तहत मुआवजा केवल आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए नहीं होता, बल्कि मानसिक कष्ट, असुविधा और उत्पीड़न की क्षतिपूर्ति के लिए भी दिया जाता है।
यह फैसला उपभोक्ता संरक्षण कानून की उस मूल भावना को मजबूत करता है, जिसके अनुसार कंपनियां अपनी घोषित योजनाओं और वादों से पीछे नहीं हट सकतीं। यदि कोई सेवा देने वाली कंपनी या संस्था अपनी गलती स्वीकार करने के बाद भी उपभोक्ता को राहत नहीं देता, तो उसे केवल मूल राशि ही नहीं बल्कि मानसिक क्षति और मुकदमेबाजी का खर्च भी चुकाना पड़ सकता है। उपभोक्ता आयोग का यह फैसला आगे के फैसलों के लिए भी नजीर साबित होगा।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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इसका मतलब क्या है
इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकते हैं और अगर कोई एयरलाइन उनसे सही सुविधाएं नहीं देती है, तो वे इसके लिए मुआवजा प्राप्त कर सकते हैं। यह मामला उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा और एयरलाइनों द्वारा उपभोक्ताओं के साथ किए जाने वाले व्यवहार को नियंत्रित करने के महत्व को दर्शाता है। यदि उपभोक्ता अपने अधिकारों को जानते हैं, तो वे भी ऐसे मामलों में भुगतान प्राप्त कर सकते हैं।
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