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तारीख पर तारीख का असली विलेन कौन?

क्या कानून की मजबूरी या सिस्टम की सुस्ती जिम्मेदार है तारीख पर तारीख के लिए?

9 जून 2026 को 09:19 pm बजे
तारीख पर तारीख का असली विलेन कौन?

हमारे देश में जब भी कोई पीड़ित न्याय की उम्मीद में अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो उसे न्याय से पहले मिलती है—एक लंबी तारीख! 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' (देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है) का नारा हम हर विमर्श में सुनते हैं। आमतौर पर माना जाता है कि कोर्ट में जज कम हैं, इसलिए मामले लंबित हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू प्रशासनिक ढिलाई है।

सूत्र: सामान्य ज्ञान के अनुसार, किसी भी आपराधिक मामले में समय पर इंसाफ की बुनियाद एक मजबूत जांच पर टिकी होती है। लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? पुलिस द्वारा समय पर चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल न करना, सरकारी फॉरेंसिक लैब से रिपोर्ट आने में महीनों लग जाना, और गवाहों को वक्त पर कोर्ट में पेश न कर पाना—यह विशुद्ध रूप से प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती है, जो कछुए की गति से चलती है।

जब तक हम जांच प्रक्रिया, पुलिस और सरकारी विभागों की जवाबदेही के लिए एक सख्त समय-सीमा (Time-limit) तय नहीं करेंगे, तब तक अदालतों का बोझ कम होना नामुमकिन है।

इसका मतलब क्या है

तारीख पर तारीख की समस्या का समाधान न्यायपालिका के अलावा प्रशासनिक स्तर पर भी है। मजबूत जांच और समयबद्ध प्रक्रिया से ही न्याय में विलंब को रोका जा सकता है। यह न केवल पीड़ितों को जल्दी न्याय दिलाने में मदद करेगा, बल्कि अदालतों के बोझ को भी कम करेगा।

#न्याय#प्रशासन#कानून

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